हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी कहा जाता है। इस साल यह त्योहार 7 मई के दिन है। वरुथिनी एकादशी के दिन वैधृति योग के साथ विष्कुंभ योग बन रहा है। वैधृति और विष्कुंभ योग को ज्योतिष शास्त्र में शुभ योगों में नहीं गिना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान शुभ कार्यों को करने से उनमें सफलता नहीं मिलती है।

वरुथिनी एकादशी महत्व

वरुथिनी एकादशी के मौके पर व्रत रखने से कष्टों से छुटकारा मिलता है। बुरी आत्माएं और दुख, पाप भी इससे दूर होते हैं। वरुथिनी का शाब्दिक अर्थ होता है सुरक्षित या जिसे बचाकर रखा जाए। इसी वजह से भगवान विष्णु के भक्त सुखमय जीवन की कामना के साथ यह व्रत रखते हैं। भविष्य पुराण में इस दिन व्रत रखने को कहा गया है। भगवान श्री कृष्ण ने खुद पांडवों के सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर को इस व्रत का महत्व समझाया था।

इन शुभ मुहूर्त में करें पूजा

ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 4 बजे से 4 बजकर 43 मिनट तक।

अभिजित मुहूर्त- दोपहर 11 बजकर 39 मिनट से 12 बजरप 32 मिनट तक।

विजय मुहूर्त- दोपहर 2 बजकर 18 मिनट से 3 बजकर 11 मिनट तक।

गोधूलि मुहूर्त- शाम 6 बजकर 31 मिनट से 6 बजकर 55 मिनट तक।

निशिता मुहूर्त- दोपहर 11 बजकर 44 मिनट से रात 12 बजकर 26 मिनट तक।

इन मुहूर्त में न करें पूजा

राहुकाल- सुबह 10 बजकर 26 मिनट से दोपहर 12 बजकर 5 मिनट तक।

यमगण्ड- दोपहर 3 बजकर 25 मिनट से शाम 5 बजकर 4 मिनट तक।

गुलिक काल- सुबह 7 बजकर 6 मिनट से रात 8 बजकर 46 मिनट तक।

दुर्मुहूर्त- सुबह 8 बजकर 6 मिनट से 8 बजकर 59 मिनट तक।

वर्ज्य- रात 10 बजकर 59 मिनट से रात 12 बजकर 44 मिनट तक और अगले दिन दोपहर 12 बजकर 32 मिनट से दोपहर 1 बजकर 25 मिनट तक।

पंचक- पूरे दिन।

Posted By: Navodit Saktawat

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