इंदौर। (कपीश दुबे): India vs Bangladesh Indore Test: सुशील दोशी ऐसा नाम है, जिसे लोग चेहरे से ज्यादा आवाज से पहचानते हैं। हिंदी क्रिकेट कमेंट्री को दुनियाभर लोकप्रिय बनाने के लिए सुशील को पद्मश्री (2016) सम्मान से नवाजा जा चुका है। मगर अपने 51 साल के करियर में पहली बार वे अपने ही घर इंदौर में टेस्ट मैच की आकाशवाणी से कमेंट्री करने जा रहे हैं। यह मौका 14 नवंबर से इंदौर में भारत और बांग्लादेश के बीच होने वाले सीरीज के पहले टेस्ट में आएगा।

खास बात यह है कि वे होलकर स्टेडियम के उसी कमेंट्री बॉक्स में बैठकर आकाशवाणी पर आंखों देखा हाल सुनाएंगे, जो उनके ही नाम पर बना है। आकाशवाणी पर बहुत सालों के बाद टेस्ट मैचों की लाइव कमेंट्री शुरू हुई है। इस मौके पर खास चर्चा में दोशी ने अपने 51 साल की यात्रा के पन्नों को फिर पलटा। उनसे चर्चा के खास अंश :

प्रश्न : क्रिकेटर न बनकर क्रिकेट कमेंट्रेटर बनने का विचार कैसे आया?

दोशी : बचपन से ही क्रिकेट का बहुत शौक था। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। 1956 में रिची बेनो की कप्तानी में ऑस्ट्रेलिया टीम टेस्ट खेलने मुंबई आई थी। मैंने भी मैच देखने की जिद की। पिता निरंजनलाल दोशी और मां मदन कुंवर ने पता नहीं कैसे गरीबी के बावजूद मुझे मैच दिखाने का फैसला लिया। पिता मुंबई लेकर गए, लेकिन टिकट नहीं मिले। चूंकि उस समय जितने लोग ब्रेबोर्न स्टेडियम के अंदर थे, उससे ज्यादा बाहर थे। चार दिनों तक भटके तो एक पुलिस वाले को दया आ गई। उसने मुझे अकेले को अंदर प्रवेश दिला दिया, उत्साह में पिता को छोड़कर अकेला अंदर चला गया। उस मैच की कमेंट्री बॉबी तलयार खाँ और विजय मर्चेंट कर रहे थे, जिनका तब बहुत नाम था। तब सोचा कि ऐसा ही करियर बनाना है, जिसमें मैच भी देखो और नाम भी हो।

प्रश्न : फिर कभी मुंबई में कमेंट्री करने का मौका मिला?

दोशी : यह रोचक संयोग है कि मैंने करियर का पहला टेस्ट उसी ब्रेबोर्न स्टेडियम में किया, जहां कभी घुसने के लिए चार दिन भटका था। मैंने 1972-73 में भारत और इंग्लैंड टेस्ट में कमेंट्री की थी। दरअसल मैं रणजी ट्रॉफी में कमेंट्री करता था और स्व. राजसिंह डूंगरपुर ने मुझे सुना था। उन्होंने कहा कि एक नया लड़का है, जिसकी आवाज में बहुत दम है। उस मैच में मेरे साथ जसदेव सिंह और जोगा राव भी थे।

प्रश्न : करियर में कितने मैचों में कमेंट्री कर चुके हैं?

दोशी : इंदौर में मेरा 87वां टेस्ट मैच है। 500 से ज्यादा वन-डे और टी-20 मैचों की कमेंट्री कर चुका हूं।

प्रश्न : जीवन का पहला रणजी मैच जिसमें आपने कमेंट्री की, क्या याद है?

दोशी : मैंने पहली बार 1968 में मप्र और राजस्थान के बीच इंदौर के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में कमेंट्री की थी। वह कभी नहीं भूल सकता।

प्रश्न : आप जितना अच्छा बोलते हैं, उतना ही अच्छा लिखते भी है। लेखन का शौक कैसे हुआ?

दोशी : मैं वैष्णव उमा विद्यालय में पढ़ता था, जहां हिंदी पर बहुत ध्यान देते थे। मेरे बड़े भाई निर्मल मुझे नईदुनिया के सुरेश गावड़े से मिलवाने ले गए। उन्होंने पूछा खेल का शौक है तो मैंने कहां-हां, क्रिकेट, टेनिस और टेबल टेनिस का ज्यादा शौक है। तब विम्बल्डन चल रहा था। मेरा लिखा आलेख उन्हें पसंद आया और तभी से लेखन भी शुरू हो गया।

प्रश्न : करियर में परिवार का कितना योगदान है?

दोशी : परिवार के समर्थन के बिना कोई आगे नहीं बढ़ता। मेरे माता-पिता ने गरीबी के बावजूद हमारे शौक जिंदा रखे। चारों बच्चों को इंजीनियर बनाया। बड़े भाई निर्मल ने हिंदी कमेंट्री और लेखन में आगे बढ़ाया। मैं कमेंट्री पर पूरा ध्यान दे सकूं, इसलिए छोटा भाई हेमंत परिवार की पूरी जिम्मेदारी संभालता है।

सुशील कुमार जैन से सुशील दोशी करना पड़ा नाम :

कम ही लोग जानते हैं कि सुशील दोशी का वास्तविक नाम सुशील कुमार जैन है। आधिकारिक दस्तावेजों में यही नाम है। वे बताते हैं, "मैं शुरुआत में सुशील कुमार जैन नाम से आलेख लिखता था। तब दिल्ली के बड़े अखबार में ख्यात खेल संपादक का भी नाम सुशील कुमार जैन था। लोगों को लगता था कि आलेख उनका है। इसलिए मैंने पिता की सलाह पर जैन की जगह दोशी लिखना शुरू किया।

यहां से दाद मिली :

बात साल 1979 की है, ओवल में भारत और इंग्लैंड के बीच चौथा टेस्ट मैच था। मेहमान टीम को जीत के लिए 438 रन का लक्ष्य मिला था, जिसमें ओपनर सुनील गावस्कर की 221 रन की पारी से भारतीय टीम 8 विकेट पर 429 रन तक पहुंच गई थी और इस रोमांच को दोशी ने अपनी आवाज से क्रिकेटप्रेमियों तक पहुंचाया तो उनके दिलों की धड़कन बढ़ गई थीं। इस उतार-चढ़ाव भरे मैच की कमेंट्री करते हुए दोशी ने जब यह कहा कि कमजोर दिल वाले इस मौके पर कमेंट्री नहीं सुने तो ये शब्द सुनकर उन्हें कईं दिग्गजों की दाद मिली। यहां तक कि डॉ. धर्मवीर भारती ने स्वदेश वापसी के बाद मुंबई में अपने निवास पर बुलाकर बधाई भी दी थी।

Posted By: Kiran Waikar