Tokyo Olympics 2020: भारतीय मुक्केबाज सतीश कुमार भले ही क्वार्टर फइनल में हार गये हैं, लेकिन उनका जज्बा और जुझारुपन अपने आप में एक मिसाल है। सतीश को प्री-क्वार्टरफाइनल के दौरान माथे और ठोड़ी पर दो गहरे कट लगे थे, उनके परिवारवाले उन्हें रिंग में उतरने से मना कर रहे थे, पत्नी ने भी लड़ने से मना किया, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उज्बेकिस्तान के सुपरस्टार बखोदिर जालोलोव के खिलाफ रिंग में उतरने का फैसला किया। हेवीवेट बॉक्सिंग में एक मुक्का भी जानलेवा साबित हो सकता है। फिर भी दो बच्चों के पिता सतीश ने इतना बड़ा जोखिम क्यों लिया? इसकी वजह पदक या मिलनेवाले इनाम का लालच नहीं था। इन विपरीत हालातों में उनके दिमाग में सिर्फ एक बात थी - खिलाड़ी कभी हार नहीं मानता!

ऐसा नहीं था कि उनके बार बच निकलने के बहाने नहीं थे। उनके माथे और ठोड़ी पर दो गहरे कट लगे थे, और 13 टांकों की मदद से ब्लीडिंग रोका गया था। घाव भरने का वक्त तो नहीं ही मिला, मुकाबले के लिए उज्बेकिस्तान का सुपरस्टार बखोदिर जालोलोव सामने था। सतीश ने कहा, ‘‘मेरी पत्नी ने मुझे नहीं लड़ने को कहा था। मेरे पिता ने भी कहा कि ऐसे लड़ते हुए देखना दर्दनाक है। परिवार आपको दर्द में नहीं देख सकता। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि मैं ऐसा करना चाहता था।’’

लेकिन इन सबके बावजूद उन्होंने लड़ने का फैसला किया। इस निर्णय को लेते वक्त उनके दिमाग में क्या चल रहा था, वो उन्होंने खुद बताया, ‘‘मेरी ठोड़ी में सात टांके और माथे पर छह टांके लगे हैं। पर मरता क्या ना करता, मैं जानता था कि मैं लड़ना चाहता था। वर्ना मैं पछतावे में ही जीता रहता कि अगर खेलता तो क्या होता। अब मैं शांत हूं और खुद से संतुष्ट भी हूं कि मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया।’’

उनके लड़ने का फैसला काफी हद तक सही साबित हुआ। सभी ने उनके जज्बे और हौसले की तारीफ की। यहां तक कि विपक्षी बॉक्सर ने भी। बुलंदशहर के सतीश ने कहा, ‘‘जोलोलोव मुकाबले के बाद मेरे पास आये, और कहा, ‘अच्छा मुकाबला था।’ यह सुनकर अच्छा लगा। मेरे कोचों ने भी कहा कि उन्हें मुझ पर गर्व है, किसी ने भी मेरे यहां तक पहुंचने की उम्मीद नहीं की थी।’’ सतीश ने कहा, ‘‘मेरा फोन बंद नहीं हो रहा, लोग बधाई दे रहे हैं जैसे मैंने जीत हासिल की हो। मेरा इलाज चल रहा है लेकिन मैं ही जानता हूं कि मेरे चेहरे पर कितने घाव हैं।’’

सतीश कुमार की उपलब्धियां कम नहीं हैं। वो दो बार एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीत चुके हैं। राष्ट्रमंडल खेलों के रजत पदक विजेता और कई बार के राष्ट्रीय चैम्पियन हैं। वो भारत की ओर से ओलंपिक में क्वालिफाई करने वाले पहले सुपर हेवीवेट मुक्केबाज भी हैं। सेना के 32 साल के जवान सतीश पहले कबड्डी खिलाड़ी थे। वहीं सेना के कोच ने उनकी प्रतिभा पहचानी और जोर देकर पर मुक्केबाजी में शामिल कर लिया।आज उन्हें इस फैसले पर गर्व है।

वैसे इस हार ने भी उन्हें हौसले को रत्ती भर भी कम नहीं किया है। वो भविष्य में भी इस तरह की चोट के बावजूद रिंग में उतरने में हिचकिचायेंगे नहीं। उन्होंने कहा, ‘‘खिलाड़ी होने का मतलब ही यही है कि आप हार नहीं मानते, कभी हार नहीं मानते।’’

Posted By: Shailendra Kumar

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