वॉशिंगटन। स्मार्टफोन धीरे-धीरे लोगों की जिंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है। आज की तारीख में कई ऐसे लोग मिल जाएंगे, जिन्हें स्मार्टफोन के बिना जीवन सूना लगने लगता है। मगर, क्या आपने सोचा है कि जीवनसाथी बनता जा रहा स्मार्टफोन आपकी जिंदगी का दुश्मन भी हो सकता है। ताजा शोध में यह बात सामने आई है कि फोन का ज्यादा इस्तेमाल जान पर भी भारी पड़ सकता है।

लंबा और स्वस्थ जीवन जीने के लिए फोन का कम इस्तेमाल महत्वपूर्ण कदम है। जब भी फोन के इस्तेमाल से शरीर पर असर की बात होती है, तब डोपामाइन का नाम सामने आता है। यह दिमाग में पाया जाने वाला रसायन है, जो हमारी आदतें निर्धारित करने में भूमिका निभाता है। किसी चीज की लत लगने में भी इसकी भूमिका रहती है। स्मार्टफोन और एप्स को इस तरह बनाया जाता है कि इनके संपर्क में रहने से डोपामाइन का स्राव बढ़ जाता है।

ऐसा होने के कारण व्यक्ति को इनकी लत लग जाती है और इनसे पीछा छुड़ाना मुश्किल हो जाता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि डोपामाइन का स्राव बढ़ने के कारण फोन हमारी आदत में शुमार हो जाता है और सोते-जागते फोन देखने का मन होता है।

बढ़ रहा स्ट्रेस हार्मोन भी

अब स्मार्टफोन के संपर्क में रहने से कार्टिसोल का स्तर बढ़ने की बात भी सामने आई है। कार्टिसोल को स्ट्रेस हार्मोन कहा जाता है। इस हार्मोन के कारण दिल की धड़कन, ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर बढ़ जाता है। किसी खतरे की स्थिति में यही हार्मोन हमें बचने की प्रेरणा देता है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी के पीछे कुत्ता पड़ जाए, तो इस हार्मोन का स्राव बढ़ जाता है और प्रतिक्रिया में व्यक्ति बचने की कोशिश करता है। मगर, भावनात्मक दबाव के क्षण में इसका स्तर बढ़ना सेहत के लिए सही नहीं होता।

दिमाग पर पड़ता है असर

वैज्ञानिकों का कहना है कि फोन के कारण कार्टिसोल का स्तर बढ़ना ज्यादा चिंताजनक है। यूनिवर्सिटी ऑफ कनेक्टिकट स्कूल ऑफ मेडिसिन के प्रोफेसर डेविड ग्रीनफील्ड ने कहा, "जब फोन आपके पास होता है, आप उसकी आवाज सुनते हैं या आवाज सुनने का अनुमान लगाते हैं, तब आपके शरीर में कार्टिसोल का स्तर बढ़ जाता है।

कार्टिसोल का बढ़ा हुआ स्तर दिमाग के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स को प्रभावित करता है। दिमाग का यह हिस्सा फैसले लेने और तार्किक सोच में मददगार होता है। इस हिस्से पर असर पड़ने से हमारे दिमाग की क्षमता कम होती है। हो सकता है कि इसके प्रभाव में व्यक्ति गाड़ी चलाते समय फोन पर मैसेज करने या बात करने का फैसला करे। इस तरह के फैसले जानलेवा साबित हो सकते हैं।

Posted By: Shashank Shekhar Bajpai