मल्टीमीडिया डेस्क। 20वीं सदी के मशहूर कवि कैफी आजमी का आज 101वां जन्मदिन है और इस मौके पर Google ने स्पेशल डूडल से उन्हें याद किया है। एक कवि, गीतकार और एक्टिविस्ट के रूप में कैफी आजमी को कौन नहीं जानता। अपनी नज्मों से किसी को भी दीवाना बना देने वाले कैफी का जन्म आज ही के दिन 1919 में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में हुआ था। उनका असल नाम सैयद अथर हुसैन रिजवी था। कैफी ने महज 11 साल की उम्र में अपनी पहली कविता लिखी और महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के प्रभाव में बड़े हुए।

बाद में उन्होंने मुंबई की तरफ कदम बढ़ाए ताकि वो एक ऊर्दू अखबर शुरू कर सकें। 1943 में उन्होंने अपनी कविताओं का पहला संकलन झंकार छापा और प्रभावशाली प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य बन गए। अपने काम के लिए कैफी को कई अवॉर्ड मिले जिसमें साहित्य और शिक्षा के लिए प्रतिष्ठित पद्मश्री, फिल्म फेयर और देश का सर्वोच साहित्यिक सम्मान साहित्य अकादमी फैलोशिप मिली।

अपनी शुरुआती कविता औरत में कैफी ने महिलाओं के सशक्तिकरण की बात कही थी। उन्होंने एक एनजीओ भी बनाया ताकि ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की जिंदगी को बेहतर बनाया जा सके। औरत ही वो कविता थी जिसने उनकी जिंदगी बदली और मोहब्बत लिखने वाले कैफी की जिंदगी में शौकत आई।

दरअसल, उन दिनों हैदराबाद के एक मुशायरे में कैफी भी थे। उन्होंने जब अपनी कविता औरत सुनाना शुरू किया तो उसके शब्द वहां बैठी एक श्रातो को पसंद नहीं आए। कविता थी...

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तू कि बेजान खिलौनों से बहल जाती है

तपती सांसों की हरारत से पिघल जाती है

पांव जिस राह में रखती है फिसल जाती है

बनके सीमाब हर इक ज़र्फ में ढल जाती है

जीस्त के आहनी सांचे में भी ढलना है तुझे

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

उस पर वहां बैठी एक महिला श्रोता इस बात से नाराज हो गई कि यह शायर तो औरतों को इज्जत देना भी नहीं जानता, कविता में उठिए की बजाय उठ कह रहा है। लेकिन जैसे-जैसे कविता आगे बढ़ी उस महिला की नाराजगी भी दूर होने लगी और आखिर तक वो अपना दिल कैफी को दे बैठी। यह थी शौकत जो बाद में कैफी की हमसफर बनी।

Posted By: Ajay Barve