सिंधु नदी ने कई बार अपना रास्ता बदला है। ऐतिहासिक अवशेषों के मुताबिक 1245 ईस्वी तक सिंधु नदी मुल्तान के पश्चिमी इलाके में बहती थी।
200 साल पहले सन् 1819 आए भीषण भूकंप के कारण भुज के पास प्राकृतिक बांध बन गए, जिससे कच्छ का रण धीरे-धीरे रेगिस्तान में तब्दील हो गया।
फिलहाल सिंधु नदी के लंबाई 3600 किमी लंबी है। एक शोध पर मुताबिक पहले इसकी लंबाई 2900 से 3200 किमी लंबी थी।
सिंध नदी पर बैराज व बांध बनने के कारण डेल्टाई इलाके में रेत आना बंद हो गई है, इस कारण इसके मुहाने पर समुद्र तेजी से आगे बढ़ रहा है।
1979 और 2015 की सैटेलाइट तस्वीरों के तुलनात्मक अध्ययन से पता चला है कि जमीन का एक बड़ा हिस्सा समुद्र निगल गया है।
सिंधु नदी दुनिया की 21 बड़ी नदियों में शामिल है। प्राचीन काल में फारस के लोग सिंधु नदी को हिंदू कहते थे। वे लोग 'स' अक्षर का उच्चारण 'ह' करते थे।
सिंधु नदी के किनारे ही हड़प्पा व मोहनजोदड़ो सभ्यता पनती। ऐसा माना जाता है कि हिंदुओं के पूर्वजों ने ही इस सभ्यता की नींव रखी थी।
मुल्तान में सिंधु चिनाब नदी के किनारे पर ही कोणार्क के सूर्य मंदिर से मिलता-जुलता मंदिर बना हुआ है। मान्यता है कि भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब ने इसे बनवाया था।
सिंधु नदी के मुहाने पर कराची के पास हिंगलाज स्थान पर हिंगलाज माता का मंदिर है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर 52 शक्तिपीठों में से एक है।
वाल्मीकि रामायण में सिंधु नदी को महानदी कहा गया है। वहीं जैन ग्रंथ जंबूद्वीप प्रज्ञप्ति में भी सिंधु नदी का उल्लेख मिलता है।
ऋग्वेद में सप्तसिंधुव में सिंधु सहित सात नदियों का उल्लेख हैं। ऋग्वेद में इन नदियों को वितस्ता, असिक्नी, परुष्णी, बिपाशा, शुतुद्रि और सरस्वती कहा गया है।