वाशिंगटन। ग्लोबल वार्मिंग की मार खेती-किसानी से लेकर रोजमर्रा के लगभग सभी कामों पर देखी जा सकती है। बढ़ते तापमान को लेकर हर तरफ चिंता जताई जा रही है। ग्लेशियरों की पिघलती बर्फ से एक ओर जहां धरती का एक बड़ा हिस्सा डूबने की आशंका है, तो दूसरी ओर तपती गर्मी के चलते बन रही सूखे की स्थिति भी चिंताजनक है। इन सबके बीच चिंता की एक और वजह सामने आई है।

एक स्टडी में पाया गया है कि गर्म होती दुनिया में डेंगू का खतरा भी बढ़ सकता है। डेंगू का आतंक भारत और ब्राजील जैसे अपेक्षाकृत गर्म वातावरण वाले देशों में ज्यादा है। मादा एडीज इजिप्टी मच्छर के कारण फैलने वाली इस बीमारी के लक्षणों में बुखार, जोड़ों में दर्द और अंदरूनी रक्तस्राव शुमार हैं। दुनियाभर में हर साल डेंगू के लगभग 10 लाख नए मामले सामने आते हैं। स्टडी में कहा गया है कि 2015 की तुलना में 2080 में दो अरब अतिरिक्त आबादी डेंगू के खतरे की जद में आ जाएगी।

विज्ञान पत्रिका नेचर माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित इस स्टडी के अनुसार, वातावरण में बढ़ती गर्मी एडीज इजिप्टी प्रजाति के मच्छरों को उन इलाकों में भी बढ़ने में मदद करेगी, जहां अभी इनका फिलहाल प्रसार कम है। दक्षिणपूर्वी अमेरिका, चीन व जापान के तटीय इलाके और ऑस्ट्रेलिया के बड़े हिस्से में ग्लोबल वार्मिंग इन मच्छरों के प्रसार की वजह बन रही है। गर्मी इन मच्छरों के शारीरिक विकास में भी मदद करती है। गर्म मौसम में मच्छर ज्यादा जल्दी काटने के काबिल हो जाते हैं। इससे उनके पास बीमारी फैलाने का वक्त भी ज्यादा रहता है।

लगातार बढ़ रहा खतरा

स्टडी के दौरान मॉडल के जरिये 2020, 2050 और 2080 के हालात का अनुमान लगाया गया। इसमें ग्लोबल वार्मिंग की वर्तमान स्थिति को केंद्र में रखते हुए डेंगू के प्रसार का आंकलन किया गया। इसमें पाया गया कि हर सूरत में डेंगू का खतरा लगातार बढ़ता जाएगा। हालांकि अगर दुनिया के बढ़ते तापमान को रोका जा सके, तो इस खतरे को भी कम किया जा सकता है।

इंसानों को ही निशाना बनाते हैं एडीज मच्छर

डेंगू, चिकुनगुनिया और जीका जैसी बीमारियां मादा एडीज इजिप्टी मच्छर के काटने से फैलती हैं। इस प्रजाति के मच्छर इसलिए भी ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि ये केवल इंसानों को काटना ही अपनी प्राथमिकता में रखते हैं। वहीं अन्य प्रजाति के मच्छर किसी भी जीव को काट लेते हैं।

इलाज की कारगर व्यवस्था नहीं

डेंगू का इलाज मुख्य तौर से इस बात पर केंद्रित रहता है कि मरीज के शरीर में पानी की कमी नहीं हो। लेकिन उल्टी एवं अन्य लक्षणों के कारण इसमें मुश्किल आती है। दूसरी ओर, अभी इसका कारगर टीका भी नहीं बन सका है। एक टीका है, लेकिन ज्यादातर लोगों पर उसे निष्प्रभावी पाया गया है।

पिछली सदी में था मलेरिया का आतंक

दक्षिणपूर्वी अमेरिका का बड़ा हिस्सा मच्छर की वजह से होने वाली बीमारियों का गढ़ रहा है। पिछली सदी के पांचवें दशक तक मलेरिया वहां बड़ा खतरा बना हुआ था, लेकिन इसके बाद मच्छर उन्मूलन अभियान ने इससे मुक्ति दिलाई। हालांकि मच्छरों को खत्म करने के लिए जिस डीडीटी रसायन का प्रयोग किया गया, उससे पर्यावरण को भी बड़ा नुकसान पहुंचा।

Posted By: Neeraj Vyas