सिंगापुर। हर कोई ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की दौड़ में अंधाधुंध भाग रहा है। कई लोगों का मानना है कि वे पैसे से सबकुछ खरीद सकते हैं। पेशे से प्लास्टिक सर्जन डॉक्टर रिचर्ड टिओ केंग सिएंग भी उनमें से एक ही थे। मगर, अब इस करोड़पति डॉक्टर का संदेश दुनिया में कई लोगों के दिलों को छू रहा है। जीवन के आखिरी दिनों में उन्हें ऐसा सबक मिला, जिसे उन्होंने दुनिया के साथ साझा किया।

उन्हें लंग कैंसर था और वह यह समझ चुके थे कि पैसा एक अच्छी चीज है, जिससे आप दुनिया की हर चीज खरीद सकते हैं। मगर, जीवन के अंतिम समय में यह किसी काम का नहीं रहता है। असली चीज है खुशी। रिचर्ड को अक्टूबर 2012 में कैंसर होने का पता चला था। 40 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई। पिछले हफ्ते उनकी कहानी साझा हुई थी, जो अब इंटरनेट पर वायरल हो रही है।

खुश होने का मतलब है धनवान होना

अपने भाषण में उन्होंने कहा था- मैं आज के समाज का एक विशिष्ट उत्पाद हूं। युवा से मैं हमेशा इस प्रभाव और धारणा में जिया कि खुश होने का मतलब है सफल होना और सफल होने का मतलब है धनवान होना। इसलिए मैंने इस आदर्श वाक्य के अनुसार अपने जीवन का नेतृत्व किया। मैंने अपने कैरियर के पहले साल में ही लाखों रुपए कमाए।

मैं स्पोर्ट्स कार का शौकीन था और कार क्लब में रेसिंग करते हुए सप्ताहांत बिताए। मिस सिंगापुर यूनिवर्स राचेल कुम और फेसबुक के सह-संस्थापक एडुआर्डो सेवरिन सहित हाई-प्रोफाइल वाले लोगों से मिला और बेहतरीन रेस्तरां में खाना खाया। मेरे पास चार स्पोर्ट्स कारें हैं, जिनमें एक होंडा S2000, निसान GTR, सुबारू WRX और फरारी 430 शामिल हैं।

फिर अवसाद ने घेर लिया मुझे

रिचर्ड ने कहा कि मैं अपने करियर के शिखर पर था। मुझे लगा कि मैं सब कुछ नियंत्रण में था। फिर 11 मार्च 2011 को मेरे परिवार को एक दुर्भाग्यपूर्ण खबर मिली, उसी दिन जब सुनामी ने जापान को तबाह कर दिया था। रिचर्ड को टर्मिनल लंग कैंसर होने का पता चला और उन्हें बताया गया कि वह तीन महीने से लेकर अधिकतम छह महीने तक ही जीवित रह सकते हैं।

उन्होंने कहा कि मैं इस बीमारी की खबर को स्वीकार नहीं कर सका। मेरी मां और मेरे पिता, दोनों के की तरफ से मेरे सौ रिश्तेदार हैं और किसी को भी कैंसर नहीं है। मगर, मुझे हुआ और यह बीमारी मेरे मस्तिष्क से लेकर रीढ़ तक फैल गई। इसकी वजह से मैं गंभीर अवसाद में घिर गया था और रात में सोने के लिए खुद पर चिल्लाया।

असली खुशी जीवन के आखिरी 10 महीनों में समझा

रिचर्ड ने कहा कि विडंबना देखिए कि वे सभी चीजें मेरे पास हैं जो सफलता के लिए जरूरी होती हैं- मेरी ट्रॉफी, मेरी कार, मेरा घर और सभी कुछ। मुझे लगा कि इससे मुझे खुशी मिली है। मगर, इन सभी के मेरे पास होने बाद भी उन्होंने मुझे कोई खुशी नहीं दी। जैसे-जैसे दिन बीतते गए मुझे एहसास हुआ कि फरारी या रेस्टोरेंट के बेहतरीन खाने से उन्हें खुशी नहीं मिलती थी।

मुझे पिछले 10 महीनों में वास्तव में खुशी मिली। मुझे जीवन के आखिरी दिनों में पता चला कि असली खुशी क्या होती है। यह लोगों, मेरे प्रियजनों, दोस्तों, परिजनों के साथ होने वाली मेरी बातचीत थी, जिससे मुझे खुशी मिली। ये वो लोग थे, जो वास्तव में मेरी चिंता करते हैं। वे मेरे साथ हंसते और रोते हैं और वे उस पीड़ा और दर्द को पहचानने में सक्षम हैं, जिससे मैं गुजर रहा था।

यदि अब मेरी जिंदगी शुरू हो, तो मैं पहले से अच्छा डॉक्टर होता

अपनी बीमारी के दौर में रिचर्ड ने कैंसर के मरीजों के साथ हमदर्दी करना भी सीखा, जो एक डॉक्टर होते हुए उन्होंने कभी महसूस नहीं किया था क्योंकि वह हमेशा फायदे के बारे में सोचते थे। खुद कैंसर का मरीज बनने से पहले मैं नहीं जानता था कि वे कैसा महसूस करते हैं। अगर आप मुझसे पूछें कि यदि मैं अपनी जिंदगी आज से शुरू कर सकूं, तो क्या मैं अलग डॉक्टर होता। मैं कह सकता हूं कि हां मैं अलग होता क्योंकि अब मैं सच में समझ कर सकता हूं कि मरीज कैसा महसूस करते हैं। कई बार इस बात को बड़े मुश्किल तरीके से सीखते हैं।

अंत में रिचर्ड ने कहा कि सफल होने में कुछ भी गलत नहीं है। अमीर होने के साथ भी कुछ भी गलत नहीं है। केवल परेशानी यह है कि बहुत सारे लोगों की तरह मैं भी इसे संभाल नहीं पाया। मैं इतना पागल हो गया कि वास्तव में मेरे लिए और कुछ भी मायने नहीं रखता था। मरीज मेरी आय के एक स्रोत थे और मैंने इन रोगियों में से हर एक से पैसे निचोड़ने की कोशिश की थी।

Posted By: Shashank Shekhar Bajpai