लंदन। जब परिवार या दोस्तों के साथ लोग होते हैं, तो वे अधिक खाते हैं और यह प्राचीन पूर्वजों से विरासत में मिली आदत की वजह से हो सकता है। एक अध्ययन में पाया गया है कि एक समूह का हिस्सा बनने का इस बात पर शक्तिशाली प्रभाव होता है कि आप कितना खाते हैं। अकेले भोजन करने की तुलना में जब लोग समूह में भोजन करते हैं, तो उनके खाना खाने की क्षमता लगभग 50 प्रतिशत बढ़ सकती है। ऐसा शायद भोजन की शिकारी-संग्रहकर्ता मानसिकता के कारण हो सकता है।

हजारों साल पहले, जितना चाहे उतना खाना खाने के लिए लोगों समूह जमा होते थे और भरपूर मात्रा में भोजन को वितरित कर सकते थे। बर्मिंघम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि जब उन्हें खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं मिलेगा, तो वे उस समय अपना बचाव करेंगे। वहीं, समूह में अधिक खाना खाने की एक अन्य संभावना उन आधुनिक कारणों की वजह से हो सकती है, जिसमें लोग खुद की अलग-अलग छवियों को अलग-अलग लोगों के लिए दिखाना चाहते हैं।

सामाजिक रूप से भोजन करना अकेले खाने की तुलना में अधिक सुखद पाया गया। मस्तिष्क का इनाम केंद्र (brain's reward centre) इसे और अधिक करने के लिए प्रोत्साहित करता है। साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर हेलेन रुडॉक ने कहा कि हमने इस बात के मजबूत सबूत पाए हैं कि अकेले खाने की तुलना में जब लोग अपने दोस्तों या परिवार के साथ खाना खाते हैं, तो वे ज्यादा भोजन करते हैं। लोग अजनबियों पर अपनी सकारात्मक छाप छोड़ना चाहते हैं, इसलिए वे उनके सामने कम खाना खाते हैं।

यही कारण है कि अजनबियों के समूहों के बीच खाने की सामाजिक सुविधा कम प्रचलित है। पिछले शोधों से पता चलता है कि हम अक्सर अजनबी व्यक्ति पर अपना अच्छा प्रभाव छोड़ना चाहते हैं। इसी आधार पर तय करते हैं कि सामने वाले व्यक्ति के सामने हमें कितना भोजन करना है और क्या खाना है।

Posted By: Shashank Shekhar Bajpai