
डिजिटल डेस्क। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 4-5 दिसंबर 2025 को होने वाली वार्षिक भारत-रूस शिखर बैठक में शामिल होने के लिए दो साल बाद भारत आ रहे हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद बदल चुके वैश्विक कूटनीतिक और रक्षा माहौल में यह उनकी पहली भारत यात्रा होगी। इस दौरान दोनों देश ऊर्जा, रक्षा, अंतरिक्ष, परमाणु सहयोग और टेक्नोलॉजी समेत रणनीतिक साझेदारी के अहम क्षेत्रों की नई रूपरेखा तय करेंगे।
भारत और रूस आने वाले वर्षों के रक्षा सहयोग को लेकर व्यापक समीक्षा करेंगे। खास फोकस अगली पीढ़ी की एयर-डिफेंस प्रणालियों पर रहेगा। सूत्रों का कहना है कि रूस की उन्नत S-500 मिसाइल प्रणाली पर बातचीत की संभावना है। भारत पहले ही S-400 सिस्टम का इस्तेमाल पाकिस्तान की ड्रोन गतिविधियों के खिलाफ किए गए ऑपरेशन ‘सिंदूर’ में कर चुका है।
एक समय भारत का 80-90% हथियार रूस से आता था, लेकिन 2014 के बाद यह निर्भरता लगातार घटी है। 2019-2023 के बीच यह हिस्सा 36% पर आ गया जो 60 साल में सबसे कम है। अब भारत फ्रांस और अमेरिका से भी बड़े पैमाने पर हथियार खरीद रहा है।
यूक्रेन युद्ध के दौरान सप्लाई चेन बाधित होने से भारत ने सप्लायर विविधता पर जोर बढ़ाया है। साथ ही ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत AK-203 राइफल और ब्रह्मोस जैसी कई रूसी प्रणालियों का स्थानीय उत्पादन भी तेजी से बढ़ा है।
रक्षा निर्भरता घटने के बावजूद ऊर्जा साझेदारी तेजी से मजबूत हुई है। 2022 में पश्चिमी प्रतिबंध लगने के बाद रूस ने भारत को रियायती कच्चा तेल देना शुरू किया। भारत जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है ने कम कीमत का पूरा लाभ उठाया।
हालांकि रूस को भारत का निर्यात अब भी 1% के आसपास है, जिससे व्यापार संतुलन रूस के पक्ष में झुका हुआ है।
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यह समिट ऐसे समय होने जा रही है जब भारत अमेरिका, फ्रांस और जापान के साथ अपनी रक्षा सहयोग क्षमता तेजी से बढ़ा रहा है। ऐसे में पुतिन की यात्रा इस बात का संकेत देगी कि बदलते वैश्विक शक्ति समीकरणों के दौर में भारत और रूस अपनी दशकों पुरानी साझेदारी को किस तरह नए सिरे से परिभाषित करते हैं। यह मुलाकात तय करेगी कि क्या दोनों देश ऊर्जा, रक्षा और तकनीक के क्षेत्र में अपने रिश्ते को अगले स्तर तक ले जा पाएंगे या नहीं।