स्टॉकहोम Nobel in chemistry रसायन विज्ञान (केमिस्ट्री) के क्षेत्र में वर्ष 2020 के लिए नोबेल पुरस्कार की घोषणा बुधवार को कर दी गई। "जीनोम एडिटिंग" की एक पद्धति विकसित करने के लिए इस वर्ष का पुरस्कार फ्रांस की विज्ञानी इमैनुएल शारपेंतिए और अमेरिका की जेनिफर डाउडना को दिया गया है। दोनों महिला विज्ञानियों ने अहम टूल "सीआरआइएसपीआर-सीएएस9" को विकसित किया है। इसे जेनेटिक सीजर्स नाम दिया गया है। इससे पहले अब तक पांच महिलाओं को केमिस्ट्री के लिए नोबेल पुरस्कार मिल चुका है। मैरी क्यूरी एकमात्र ऐसी महिला हैं जिन्हें फिजिक्स और केमिस्ट्री दोनों के लिए नोबेल पुरस्कार मिला है। अब तक 111 बार केमिस्ट्री का नोबेल पुरस्कार दिया गया है।

नोबेल ज्यूरी ने कहा, "इनके प्रयोग से शोधकर्ता जानवरों, पौधों और सूक्ष्मजीवों के डीएनए को अत्यधिक उच्च परिशुद्धता के साथ बदल सकते हैं। इस तकनीक का जीवन विज्ञान पर एक क्रांतिकारी प्रभाव पड़ा है। यह ना केवल नए कैंसर उपचार में योगदान कर रहा है बल्कि विरासत में मिली बीमारियों के इलाज के सपने को सच कर सकता है।"

नोबेल ज्यूरी के चेयरपर्सन क्लेस गुस्ताफसन ने इसे मानव जाति के लिए एक महान तोहफा बताया है। हालांकि उन्होंने इसे सावधानी से इस्तेमाल करने की नसीहत भी दी। फ्रांस की इमैनुएल शारपेंतिए ने पुरस्कार मिलने पर खुशी जताते हुए कहा कि यह उन लड़कियों को प्रेरित करेगा जो विज्ञान के क्षेत्र में काम करना चाहती है।

वहीं अमेरिका की जेनिफर डाउडना ने कहा कि मुझे उम्मीद है कि इसका उपयोग जीव विज्ञान में नए रहस्यों को उजागर करने और मानव जाति को लाभ पहुंचाने के लिए किया जाएगा। चिकित्सा और फिजिक्स के लिए नोबेल पुरस्कारों की घोषणा पहले ही की जा चुकी है।

पिछले साल लिथियम-आयन बैटरी बनाने वाले विज्ञानियों-जॉन बी गुडइनफ, एम स्टेनली विटिंघम और अकीरा योशिनो को नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था। नोबेल पुरस्कार के तहत स्वर्ण पदक, एक करोड़ स्वीडिश क्रोना (तकरीबन 8.20 करोड़ रुपये) की राशि दी जाती है। स्वीडिश क्रोना स्वीडन की मुद्रा है।

नैतिक सवालों से जूझ रहा वैज्ञानिक समुदाय

दरअसल, जीनोम एडिटिंग को लेकर विज्ञानी समुदाय पिछले काफी समय से नैतिक सवालों से जूझ रहा है। वर्ष 2018 में ही सीआरआइएसपीआर के बारे में अधिकांश लोग जान गए थे, जब चीनी विज्ञानी डॉ. ही जियानकुई ने दुनिया को बताया था कि उन्होंने दुनिया के पहले जीन-एडिटेड शिशुओं को बनाने में मदद की थी। हालांकि उनके काम को मानव सभ्यता के लिए उपयुक्त नहीं माना गया। बाद में विशेषज्ञों के एक अंतरराष्ट्रीय पैनल ने एक रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि फिलहाल जीन एडिटेड शिशुओं को बनाना जल्दबाजी होगी क्योंकि विज्ञान अभी भी पर्याप्त उन्नत नहीं है।

पेटेंट को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई

सीआरआइएसपीआर तकनीक पर पेटेंट को लेकर हार्वर्ड स्थित ब्राड इंस्टीट्यूट और एमआइटी लंबी अदालती लड़ाई में उलझे हैं। इस पर कई अन्य विज्ञानियों ने भी काम किया है, लेकिन दोनों महिला विज्ञानियों को इसे आसानी से प्रयोग होने वाले उपकरणों में बदलने के लिए इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

Posted By: Sandeep Chourey

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