लंदन। 13 साल पहले, ग्रीस के पहाड़ी इलाके में एक बोइंग विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें 121 लोगों की मौत हो गई थी। एक साल बाद जांचकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि विमान हादसे की प्रमुख वजह केबिन प्रेशर का कम हो जाना था। गुरुवार सुबह जेट एयरवेज की फ्लाइट में सवार 166 यात्रियों के सामने भी वैसी ही परिस्थिति बनी थी। हालांकि, शायद किसी को भी एक दशक पहले ग्रीस में हुई घटना के बारे में पता नहीं था।

जेट एयरवेज के यात्रियों को इस स्थिति का सामना इसलिए करना पड़ा क्योंकि कॉकपिट क्रू केबिन प्रेशर को नियंत्रित करना भूल गया था। इसकी वजह से मुंबई से जयपुर की फ्लाइट के दौरान करीब 30 यात्रियों के नाक-कान से खून निकलने लगा था और यात्रियों ने सिरदर्द की शिकायत की थी।

दोनों पायलट्स को डी-रोस्टर कर दिया गया है यानी जांच होने तक उनके विमान उड़ाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके साथ ही मामले की जांच के आदेश दे दिए गए हैं। एयरलाइन ने इस घटना पर खेद व्यक्त किया है। दो वरिष्ठ पायलट्स और नियामक अधिकारियों के मुताबिक, गुरुवार की घटना मानव लापरवाही के कारण हो सकती है क्योंकि केबिन प्रेशर की जांच स्टैंडर्ड चेक्स का हिस्सा है जो उड़ान के पहले किया जाता है।

केबिन के डी-प्रेशराइजेशन के कारण हवाई यात्रियों के नाक और कान से खून निकलने की घटना दुर्लभ ही होती है। बताते चलें कि आमतौर पर एक विमान को 8,000 फीट पर प्रेशराइज किया जाता है, ताकि मानव शरीर के लिए प्रेशर पर्याप्त बना रहे। आमतौर पर विमान करीब 35,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ता है।

बताते चलें कि जेट एयरवेज की मुंबई-जयपुर फ्लाइट में सवार एक यात्री ने इस घटना के बाद एयरलाइन से 30 लाख रुपए का मुआवजा और 100 अपग्रेड वाउचर की मांग की है। एयरलाइन के सूत्रों ने गुरुवार को यह जानकारी दी। इस यात्री ने एयरलाइन पर देखभाल में कमी का आरोप लगाया है। इस यात्री को चार अन्य यात्रियों के साथ इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया था। कानूनन अगर कोई यात्री किसी एयरलाइन से यात्रा के दौरान घायल होता है, तो एयरलाइन को उसे मुआवजा देना होता है।

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