
बिजनेस डेस्क। जब हम घर खरीदते हैं, तो आमतौर पर सबसे पहले कुछ सामान्य सवाल पूछते हैं। क्या मैं EMI चुका सकता/सकती हूं? लोकेशन सही है? प्रॉपर्टी की कीमत कितनी बढ़ेगी? स्कूल, ऑफिस या मेट्रो कितनी दूर है? लेकिन इन सभी सवालों से पहले एक सवाल पूछा जाना चाहिए: क्या घर खुद सुरक्षित है?
दिल्ली के सत्या निकेतन में पांच मंजिला इमारत के ढहने की घटना, जिसमें सात लोगों की जान गई, इस बात की गंभीर याद दिलाती है कि इस सवाल को महज एक औपचारिकता नहीं माना जा सकता। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह इमारत कम से कम 55 साल पुरानी थी और इसमें रेनोवेशन का काम भी हुआ था। इसमें मुख्य रूप से छात्र रहते थे। अधिकारियों ने बेसमेंट में चल रहे निर्माण कार्य और पानी जमा होने की भूमिका की भी जांच की।
हमें इसे देश में बढ़ती आवास की जरूरत के व्यापक संदर्भ में भी देखना होगा। Mordor Intelligence के अनुसार, भारत का स्टूडेंट अकोमोडेशन मार्केट 2031 तक USD 828.93 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। यह बताता है कि उच्च शिक्षा के लिए अधिक छात्रों के शहरों की ओर आने के साथ आवास की जरूरत कितनी तेजी से बढ़ रही है। यह दबाव अब केवल छात्र आवास तक सीमित नहीं है। भारत की तेजी से बढ़ती शहरी आबादी के कारण शहरों में अफोर्डेबल, रेंटल और पहली बार घर खरीदने वालों के लिए आवास की मांग भी बढ़ रही है।
लेकिन चाहे बात अपना पहला घर खरीदने वाले परिवार की हो, अपार्टमेंट किराए पर लेने वाले युवा प्रोफेशनल की या PG में रहने वाले छात्र की, किफायती कीमत सुरक्षा की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। मेरा मानना है कि हर होमबायर या रेंटर को ये पांच चेक जरूर करने चाहिए।
किसी प्रॉपर्टी का बिक्री या किराए के लिए उपलब्ध होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसे मौजूदा तरीके से इस्तेमाल करने की मंजूरी है। स्वीकृत बिल्डिंग प्लान, ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट और लागू अनुमतियों की जांच करें। अगर यह PG, हॉस्टल या कई यूनिट्स में बदली गई प्रॉपर्टी है, तो यह जरूर जांचें कि इसका मौजूदा इस्तेमाल अधिकृत है या नहीं।
दिल्ली नगर निगम (MCD) के राजधानी में 2,453 PG अकोमोडेशन के सर्वे में नियमों के पालन से जुड़ी बड़ी कमियां सामने आईं। केवल 31 इमारतों यानी 1.2% के पास दिल्ली फायर सर्विस की NOC थी, जबकि केवल 729 प्रॉपर्टीज यानी 30% से भी कम के बिल्डिंग प्लान स्वीकृत थे। सिर्फ आठ इमारतों के पास स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट था। यह सर्वे MCD के सभी 12 जोन में किया गया था और सत्या निकेतन हादसे के बाद दिल्ली हाई कोर्ट की चिंताओं के बीच कराया गया था।
ये आंकड़े खास तौर पर PG अकोमोडेशन से जुड़े हैं, पूरे हाउसिंग मार्केट से नहीं। लेकिन वे एक बड़े मुद्दे की ओर इशारा करते हैं: दस्तावेज और सुरक्षा की जांच को घर चुनने के बाद की औपचारिक प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। इसे घर चुनने के फैसले का हिस्सा होना चाहिए।
एक अच्छी तरह डिजाइन किया गया अपार्टमेंट भी किसी पुरानी या खराब तरीके से मेंटेन की गई इमारत का हिस्सा हो सकता है। बिल्डिंग की उम्र, स्ट्रक्चरल इंस्पेक्शन, बड़े रेनोवेशन और दीवारों, कॉलम, स्लैब या बेसमेंट में किए गए किसी बदलाव के बारे में पूछें।
लगातार बनी रहने वाली नमी, पानी का रिसाव, बड़ी दरारें, बाहर निकला हुआ रिइनफोर्समेंट या बार-बार की गई स्ट्रक्चरल रिपेयर के संकेतों पर ध्यान दें।
पुरानी प्रॉपर्टीज के मामले में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। साइट विजिट या सेल्स ब्रोशर से आपको वह जानकारी नहीं मिल सकती जो एक योग्य स्ट्रक्चरल इंजीनियर के स्वतंत्र आकलन से मिल सकती है। सत्या निकेतन की घटना यह भी याद दिलाती है कि किसी पुरानी इमारत को केवल रेनोवेट कर देना जरूरी नहीं कि उसे सुरक्षित बना दे। किसी भी बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव के लिए पर्याप्त तकनीकी निगरानी जरूरी है।
होमबायर्स आमतौर पर पार्किंग, पावर बैकअप, लिफ्ट और दूसरी सुविधाओं की जांच करते हैं। इमरजेंसी एग्जिट को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए। जांचें कि सीढ़ियां और एग्जिट आसानी से इस्तेमाल किए जा सकते हैं या नहीं, फायर एक्सटिंग्विशर और अलार्म काम कर रहे हैं या नहीं और प्रॉपर्टी के पास लागू फायर क्लीयरेंस है या नहीं।
अतुल मोंगा सीईओ और सह-संस्थापक बेसिक होम लोन के अनुसार बड़ी रेजिडेंशियल बिल्डिंग्स में खरीदारों को यह भी समझना चाहिए कि इमरजेंसी में बाहर निकलने के रास्ते क्या हैं और फायर-फाइटिंग सिस्टम की नियमित रूप से देखभाल होती है या नहीं।
परिवार, छात्र या घर से दूर रहने वाले युवा प्रोफेशनल के लिए यह जानना कि इमरजेंसी की स्थिति में क्या होगा, उतना ही महत्वपूर्ण होना चाहिए जितना किराए या EMI की जानकारी होना।
सुरक्षा का एक पहलू डेंसिटी भी है। किसी निश्चित संख्या में लोगों के रहने के लिए बनाई गई बिल्डिंग पर दबाव काफी बढ़ सकता है, अगर कमरों को छोटे हिस्सों में बांट दिया जाए, अतिरिक्त फ्लोर बना दिए जाएं या कॉमन एरिया को रहने की जगह में बदल दिया जाए।
पूछें कि बिल्डिंग में कितने लोग रहते हैं, क्या कोई अनधिकृत एक्सटेंशन है और क्या बेसमेंट, टेरेस, कॉरिडोर या पार्किंग एरिया का इस्तेमाल उनके स्वीकृत उद्देश्य से अलग तरीके से हो रहा है।
घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में यह खास तौर पर महत्वपूर्ण है, जहां बढ़ती मांग किसी प्रॉपर्टी के इस्तेमाल के तरीके को तेजी से बदल सकती है।
सबसे सस्ती प्रॉपर्टी जरूरी नहीं कि सबसे किफायती प्रॉपर्टी हो। कानूनी समस्याओं, खराब निर्माण गुणवत्ता, अपर्याप्त फायर सेफ्टी या ज्यादा मेंटेनेंस जरूरतों वाली प्रॉपर्टी खरीदने के बाद ऐसे खर्च सामने आ सकते हैं, जिनका अंदाजा शुरुआत में नहीं होता।
अतुल मोंगा सीईओ और सह-संस्थापक बेसिक होम लोन के अनुसार यहीं से हाउसिंग से जुड़े फैसलों को भी बदलने की जरूरत है। हमें कीमत, नियमों का पालन, निर्माण गुणवत्ता और लंबे समय की सुरक्षा को एक साथ देखकर फैसला करना होगा।
भारत को और ज्यादा घरों की जरूरत है। उसे ज्यादा अफोर्डेबल हाउसिंग की जरूरत है। शिक्षा और रोजगार के लिए लोगों के शहरों की ओर बढ़ते पलायन के साथ स्टूडेंट और रेंटल हाउसिंग की जरूरत भी बढ़ रही है।
लेकिन लक्ष्य केवल ज्यादा से ज्यादा यूनिट्स बनाना नहीं हो सकता। हमें ऐसे घर चाहिए जिन्हें लोग अफोर्ड कर सकें, वेरिफाई कर सकें और जिन पर भरोसा कर सकें।
क्योंकि घर की असली कीमत सिर्फ हमारे सिर पर मौजूद छत में नहीं है। उस छत से मिलने वाली सुरक्षा में भी है।