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गोद में नौ माह की बेटी, कंधे पर बच्चों का भविष्य और सामने उफनती नदी... फिर भी नहीं रुकते कदम

बलरामपुर जिले के वाड्रफनगर विकासखंड स्थित धौरपुर गांव के प्राथमिक स्कूल में पदस्थ महिला शिक्षिकाएं कर्मिला टोप्पो और संध्या हालदार रोज अपनी जान जोखिम ...और पढ़ें

By Asim Sen GuptaEdited By: Manoj Kumar Tiwari
Publish Date: Sun, 20 Sep 2026 06:17:00 PM (IST)Updated Date: Sun, 20 Sep 2026 06:17:00 PM (IST)
गोद में नौ माह की बेटी, कंधे पर बच्चों का भविष्य और सामने उफनती नदी... फिर भी नहीं रुकते कदम
दो शिक्षिकाओं का जज्बा बना मिसाल. प्रतीकात्मक चित्र (एआइ निर्मित)

HighLights

  1. यह नौकरी नहीं, तपस्या है, 9 बच्चों के भविष्य के लिए जान जोखिम में डालकर नदी पार कर रहीं शिक्षिकाएं
  2. कलेक्टर ने कहा- सैल्यूट है ऐसे जज्बे को, बलरामपुर की शिक्षिकाएं नदी पार कर बच्चों तक पहुंचा रहीं शिक्षा
  3. आजादी के दशकों बाद भी टापू बना गांव, जान पर खेलकर उफनती नदी पार करने को मजबूर महिला शिक्षिकाएं

असीम सेनगुप्ता नईदुनिया प्रतिनिधि,अंबिकापुर: यह तस्वीर किसी फिल्म की नहीं, बल्कि हकीकत की है... एक मां, जिसकी गोद में नौ माह की मासूम कपड़े से बंधी है, दूसरी हाथ में छाता और कंधे पर बैग लिए... सामने घुटने भर उफनता पानी और पथरीला रास्ता... फिर भी दो महिला शिक्षिकाएं रोज इसी रास्ते से बच्चों तक शिक्षा का उजाला पहुंचा रही हैं।

नदी में बाढ़ होने पर स्कूल तक नहीं पहुंच पाने से इन्हें निराशा भी होती है कि आज बच्चों को पढा नहीं पाए। बलरामपुर जिले के वाड्रफनगर विकासखंड के सुदूर ग्राम धौरपुर में पदस्थ इन दो शिक्षिकाओं की कहानी हर किसी को प्रेरित कर रही है।


वाड्रफनगर जनपद के ग्राम पंचायत मढ़ना का आश्रित ग्राम धौरपुर है। जंगलों के बीच बसा यह गांव, जहां महज 15 से 20 घर हैं। यहां तक पहुंचने के लिए बरसात में मोरन और इरिया नदी के संगम को पार करना पड़ता है। शासन ने 2005 में यहां प्राथमिक शाला शुरू की थी, ताकि अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा पहुंचे। इस वर्ष यहां नौ बच्चे दर्ज हैं और उन्हें पढ़ाने के लिए दो महिला शिक्षिकाएं कर्मिला टोप्पो और संध्या हालदार पदस्थ हैं।

तीन किलोमीटर पैदल, फिर नदी पार... तब मिलते हैं नौ नन्हे चेहरे

शिक्षिकाओं ने बताया कि वे घर से निकलते तो स्कूटी से हैं लेकिन उसे मढ़ना गांव में ही खड़ा करना पड़ता है।उसके बदल लगभग तीन किलोमीटर पथरीला रास्ता पैदल तय करते हैं, फिर नदी पार करते हैं। डर तो लगता है, पानी का बहाव होता है, गोद में बच्ची भी रहती है। कर्मिला टोप्पो वर्ष 2014 से इसी स्कूल में पदस्थ हैं और हर बरसात में यही संघर्ष उनकी दिनचर्या बन गया है। जबकि संध्या हालदार की पदस्थापना उनके बाद हुई है।

बच्चे हमारी प्रतीक्षा करते हैं इसलिए हर दिन जाने की इच्छा

इतनी परेशानी और जीवन को दांव पर रखकर बच्चों को पढ़ाने जाने के सवाल पर थोड़ी देर तक तो वे चुप रहती हैं लेकिन जवाब में दोनों की आंखों में बच्चों के लिए ममता झलकती है। कहती हैं,बच्चे हमारा इंतजार करते हैं कि मैडम कब आएगी।हम नहीं जाएंगे तो उनका क्या होगा? उनके भविष्य का सवाल है। जब पानी ज्यादा होता है और हम नहीं पहुंच पाते तो रात भर मन उदास रहता है। शिक्षिकाओं ने कहा कि विभागीय अधिकारी परिस्थितियों से वाकिफ है इसलिए नदी में पानी का बहाव तेज होने पर स्कूल नहीं जाने की समझाइश भी देते हैं।

आश्रम,छात्रावास में शिफ्ट कर सकते हैं बच्चों को

एक ओर जहां इन शिक्षिकाओं का समर्पण प्रेरणा है, वहीं यह व्यवस्था पर सवाल भी खड़ा करता है। क्या बरसात के दिनों में इन नौ बच्चों को नजदीकी आश्रम-छात्रावास में शिफ्ट नहीं किया जा सकता, ताकि उनकी पढ़ाई निर्बाध चलती रहे और शिक्षिकाओं को जान जोखिम में न डालना पड़े?

सरकार जब अंतिम छोर तक सड़क, बिजली, पानी का दावा करती है तो धौरपुर तक एक पुलिया, एक पहुंच मार्ग क्यों नहीं बन पाया? बरसात में यह गांव क्यों टापू बन जाता है?शिक्षिकाएं तो अपना धर्म निभा रही हैं, अब बारी प्रशासन की है कि वह इनके हौसले को सम्मान दे और धौरपुर तक सुविधाओं का पुल बनाए।

कलेक्टर ने कहा- यह कर्तव्य नहीं, तपस्या है

इन शिक्षिकाओं की कर्त्तव्यनिष्ठा कलेक्ट्रेट बलरामपुर तक पहुंच चुकी है।कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी ने कहा कि मुझे मीडिया के माध्यम से हमारे जिले की एक शिक्षिका के बारे में पता चला, जो बरसात के मौसम में भी अपने छोटे बच्चे को गोद में लेकर नदी पार करके तीन किलोमीटर पैदल चलकर अपने स्कूल पहुंचती हैं।

अपनी अटूट निष्ठा और मेहनत से उन्होंने जिले के अन्य शिक्षकों के लिए एक सराहनीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। मैं ऐसे शिक्षकों का बहुत सम्मान करती हूं जो अपने कर्तव्यों के प्रति इतने समर्पित हैं,ऐसे शिक्षक सचमुच दुर्लभ हैं। उनके जैसी शिक्षिका को सम्मानित करना पूरे जिले के लिए गर्व और गौरव की बात है।यह सिर्फ नौकरी नहीं, तपस्या है। ऐसे शिक्षकों से अन्य शिक्षकों को सीख लेनी चाहिए। यह वाकई काबिले तारीफ है।