अंबिकापुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। सरगुजा जिले में अब बकरी पालन किसानों के लिए आर्थिक आय का प्रमुख जरिया बन चुका है। स्थानीय नस्ल की बकरियों से किसानों को ज्यादा लाभ नहीं मिलता था, इसलिए अब प्रशासन ने पशुपालन विभाग के सहयोग से जमुनापारी व सिरोही नस्ल से कृत्रिम गर्भाधान शुरू कराया है, जिसका परिणाम भी अब बेहतर आने लगा है। सरगुजा के अब गांव-गांव में अब स्थानीय नस्ल के बकरे व बकरियां नहीं बल्कि आगरा की जमुनापारी और राजस्थान की सिरोही नस्ले नजर आने लगी हैं। यह बकरियां सरगुजा के किसानों के एटीएम हैं। किसानों को जब भी पैसे की जरूरत पड़ती है इसे बेचकर कर काम चलाते हैं। अब तो पशुपालन विभाग भी बकरी को किसानों का एटीएम कहने लगा है।
सरगुजा व सूरजपुर जिले में नस्ल सुधार योजना पहली बार शुरू हुई है। आगरा, इटावा के जमुनापारी और राजस्थान के सिरोही नस्ल का कृत्रिम गर्भाधान कराया जा रहा है जिसमें सफलता भी मिल रही है। उत्तर छत्तीसगढ़ में पहली बार बकरियों में कृत्रिम गर्भाधान की शुरुआत हो चुकी है। सैकड़ों बकरियों में कृत्रिम गर्भाधान का सकारात्मक परिणाम सामने आने लगा है। बकरियों के नस्ल सुधार में यह कारगर साबित हो रहा है। सरगुजा कलेक्टर संजीव झा ने अब पशुपालन विभाग के माध्यम से जिले के सभी विकास खंडों में बकरी पालन को अतिरिक्त आय का जरिया बनाने कृत्रिम गर्भाधान की सुविधा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं, इसके लिए उन्होंने अतिरिक्त राशि स्वीकृत की है ताकि किसी प्रकार की कोई समस्या सामने न आ सके। बकरियों के नस्ल सुधार की दिशा में कार्य करने वाला सरगुजा जिला सूरजपुर के बाद दूसरा जिला बन गया है। देसी नस्ल के बकरा-बकरियों से कम मांस मिलता है। बकरियों से दूध नहीं मिल पाने के कारण पहली बार पशुपालन विभाग ने सेंट्रल गोट रिसर्च इंस्टीट्यूट मथुरा से संपर्क किया था। यहां जानकारी मिली की कृत्रिम गर्भाधान के जरिए बकरियों के नस्ल सुधार का काम आसानी से किया जा सकता है। देश के कई राज्यों में इसका प्रयोग सफल भी हो चुका है। शुरुआती चरण में सूरजपुर जिले के प्रतापपुर, भैयाथान और ओड़गी विकासखंड में बकरियों के नस्ल सुधार के लिए कृत्रिम गर्भाधान आरंभ किया गया था। परिणाम सकारात्मक आने के बाद अब सरगुजा जिले में बकरियों में कृत्रिम गर्भाधान किया जा रहा है। वरिष्ठ पशु चिकित्सक सीके मिश्रा के साथ चिकित्सक और कर्मचारी बकरियों के नस्ल सुधार की दिशा में प्रयासरत हैं। कलेक्टर संजीव झा ने पशुपालन विभाग द्वारा नस्ल सुधार के लिए किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए पशुपालन विभाग के पशु रोगी कल्याण समिति को एक लाख की अतिरिक्त राशि प्रदान की है ताकि नस्ल सुधार के लिए सीमेन की उपलब्धता में कोई बाधा न आए। कृत्रिम गर्भाधान का लाभ बकरी पालने वालों को मिलने लगा है। पशु रोगी कल्याण समिति सरगुजा द्वारा सेंट्रल गोट रिसर्च इंस्टीट्यूट मथुरा से सीमेन की उपलब्धता सुनिश्चित कराई जा रही है। यह संस्था भारत सरकार से जुड़ी हुई है और देश के अलग-अलग राज्यों में बकरियों के नस्ल सुधार के लिए प्रयासरत है। सेंट्रल गोट रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा सीमेन की आपूर्ति की जा रही है। अब जिले में उन्नत नस्ल के बकरे-बकरी ही नजर आ रहे हैं। इसका सीधा लाभ पशुपालकों को मिलने लगा है। खेती के अलावा अतिरिक्त आय अर्जित करने का यह सशक्त माध्यम बन रहा है।
सरगुजा के हर घर में पालते हैं बकरी-
सरगुजा जिले में हर घर में बकरी पालन की परंपरा है। खेती के साथ बकरी पालन को लोगों ने आय का जरिया बनाया है। वषोर् से यहां लोग खेती के साथ बकरी पालन करते आ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र में हर घर में दो चार बकरियां नजर आती हैं। विपरीत समय में बकरी-बकरों को बेचकर ही किसान काम चलाते हैं। इसलिए बकरी को किसानों का एटीएम कहा जाता है। किसान जब चाहता है तब बकरों को बेचकर आय अर्जित करता है। सरगुजा में बकरी बकरे का पालन सिर्फ और सिर्फ मांस बिक्री के लिए होता है। चिकित्सकों के मुताबिक जमुनापारी और सिरोही नस्ल के बकरे का वजन 40 से 45 किलो तक होता है, जबकि स्थानीय बकरे का वजन महज 20 से 25 किलो ही होता है।
सरगुजा में आएगी नई क्रांति,किसान हैं उत्साहित-डॉ.सीके मिश्रा
सरगुजा जिले के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डा. सीके मिश्रा इस अभियान का संचालन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मैंने सूरजपुर जिले में इसकी शुरुआत की थी। अब सरगुजा में पदस्थ होने के बाद कलेक्टर संजीव झा की पहल पर यह अभियान शुरू हुआ तो सफलता भी मिल गई है। सरगुजा में बकरी पालन के लिए नई क्रांति आ रही है। किसानों ने सोचा नहीं था कृत्रिम गर्भाधान से इतना लाभ मिलेगा। प्रथम चरण में जिन गांव में बकरियों का कृत्रिम गर्भाधान किया गया था उससे अब जमुनापारी और सिरोही नस्ल के बकरे जन्म लेने लगे हैं, जो काफी स्वस्थ हैं। लगातार अभियान जारी है। सरगुजा में किसानों का असली साथ ही बकरी-बकरे हैं। विपरीत परिस्थिति में यह बकरी-बकरे किसानों के लिए एटीएम का काम करते हैं।