बैकुण्ठपुर, अंबिकापुर। सरगुजा अंचल का लोकपर्व करमा धूमधाम से मनाया जा रहा है। सरगुजा में आदिवासियों का यह सबसे बड़ा और प्रमुख पर्व है। आदिवासियों के इस पारंपरिक लोक पर्व पर अब आधुनिकता का रंग चढ़ने लगा है। लोक वाद्य के साथ रंग-बिरंगे पोशाक में पूरी रात करमा नृत्य गीत की गूंज अब सरगुजा के ग्रामीण अंचलों में कम सुनाई देने लगी है।
सरगुजा संभाग के सभी जिलों में यह पर्व मनाया जा रहा है। करमा पर्व अब केवल गांव के चुनिंदा घरों में पर्व के दिन शाम से देर रात तक करम की डाल आंगन में गाड़ कर पूजा करने और गांव के बैगा द्वारा कथा सुनाने तक सिमटता जा रहा है।
आदिवासी संस्कृति की निशानी है यह पर्व
आधुनिकता ने सरगुजा के इस पारंपरिक लोक पर्व पर अपना असर डाला है। इस कारण करमा नृत्य की प्रतियोगिताएं कभी भी आयोजित होने लगी हैं। जबकि सरगुजा की मूल आदिवासी संस्कृति को जीवित रखने की बात करने वाले लोग इस पर आपत्ति भी दर्ज करा रहे हैं।
आदिवासियों का कहना है करमा हमारी आदिवासी संस्कृति की सभ्यता की निशानी है और भादो मास के एकादशी तिथि को हम प्रकृति की पूजा करते हैं उनका आह्वान करते हैं। ऐसे में करमा को प्रतियोगिता जैसे आयोजन कर आदिवासियों की धार्मिक आस्था को भी आहत किया जा रहा है।
इस दिन मांदर की थाप पर थिरकते हैं पैर
हालांकि इन सब के बावजूद सरगुजिहा करमा ने प्रदेश की राजधानी के साथ देश की राजधानी सहित कई शहरों में लोक कला का लोहा मनवाया है। सरगुजिहा आदिवासी संस्कृति के इस लोक पर्व को भादो मास के शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि के दिन मनाया जाता है।
गुरुवार को यह तिथि थी और सरगुजा के आंचल में महिलाएं व्रत रखकर शाम को पूजा अर्चना कर करमा खेलने में जुटी थीं, लेकिन पहले जैसा नजारा देखने को नहीं मिला। सरगुजा का करमा कई कई दिनों तक चलते रहता है।
करमा पर्व के दूसरे दिन सुबह सरगुजा की पारंपरिक वाद्य यंत्र मांदर व झांझ की झंकार इतनी गूंजती है कि आदिवासी ही नहीं अन्य समाज के लोग भी झूम उठते हैं। करमा गीत गाकर गांव के मुखिया व प्रमुख लोगों के घरों तक पहुंचते है। सरगुजा और कोरिया में शुक्रवार को कई स्थानों पर कर्मा नृत्य का आयोजन हुआ। इनमें से एक आयोजन में राज्य के खेल मंत्री भैया लाल राजवाड़े भी शामिल हुए।
यह है मान्यता
आदिवासियों की मान्यता है कि करमी के वृक्ष डंगाल आंगन में गाड़ कर पूजा करने का अर्थ यह है कि करम वृक्ष में देवता वास करते हैं। इसलिए इस वृक्ष के डंगाल की पूजा होती है। 1 सप्ताह पूर्व गांव की सभी महिलाएं बांस के छोटे छोटे टोकने में मक्का धान उड़द जैसे अनाज और दलहन की जाई तैयार करते हैं।
करमा के दिन गांव के किसी एक घर में पहुंचते हैं जहां कर्म देव की पूजा होती है। टाकनी में ज्वारा के साथ दीया जलाकर कन्या एवं महिलाएं एक साथ निकलती है तो पूरा माहौल भक्ति भाव हो जाता है। इस डालिए को करम डार के नीचे रखा जाता है फिर उपवास रखने वाली महिलाएं पूजा के लिए बैठती हैं।
गांव का बैगा कथा सुनाता है और पूजा कराता है। उपवास रखने वाली महिलाएं इस ऋतु में होने वाले खीरा को लेकर जाती हैं जिसे पुत्र का प्रतीक माना जाता है। इस कारण महिलाएं खीरा की पूजा करती हैं और अपने पुत्र के सुख समृद्धि की कामना करती हैं। पूजा के बाद शुरू होता है मांदर की थाप के साथ नृत्य गीत।
यह है करमा गीत
महिलाएं व पुरुष एक साथ कुछ इस तरह गीत गाती हैं ....अरे सब दीना करम राजा रने बने...ताज करम आंगना में ठाड़...सब दीना करम राजा पानी के आहार...हा रे हो दूध के आहार...इस गीत के बाद कई करमा गीत गाते हैं जिसमे हर कोई झूम उठता है।
संस्कृति को विलुप्त होने से बचाना होगा
आदिवासी संस्कृति व सरगुजा के विलुप्त हो रहे लोक वाद्य पर शोध करने वाले अजय कुमार चतुर्वेदी का कहना है कि सरगुजा संभाग में रहने वाले आदिवासियों की प्रमुख संस्कृति आलोक कला की झलक करमा पर्व से ही दिखती है समय के साथ इसका स्वरूप बदल रहा है और नई पीढ़ी के आदिवासी युवा इसे नहीं समझ रहे।
इस कारण लोक कला तो विलुप्त हो ही रही है, आदिवासियों की कर्मा संस्कृति को लोग अब जानने समझने से भी दूर हो रहे हैं। अजय का कहना है हालांकि अभी भी सरगुजा संभाग के शहरी इलाकों को छाेड दें तो दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में करमा पर्व जिस उत्साह व पारंपरिक तरीके से मनाया जाता है उसे देख हर शख्स भाव विभोर हो जाता है।
संस्कृति को बचाने के लिए शिक्षक की पहल
रामानुजगंज रोड पर स्थित भफोली में रहने वाले शिक्षक धनंजय जयसवाल ने करमा की परंपरा को बचाए रखने अनूठी पहल की है। उन्होंने अपने घर पर करम डाल गाड़ कर गांव की सभी महिलाओं को पूजा-अर्चना के लिए आमंत्रित किया।
इस बार घोषणा की है कि जिस महिला या जिस बालिका का ज्वारा सबसे सुंदर रहेगा उसे उचित इनाम पुरस्कार देकर सम्मानित करेंगे। शिक्षक की इस पहल की ग्रामीणों ने खूब प्रशंसा की है।
इसकी शुरुआत उन्होंने इस बार से ही कर दी और गांव के सबसे सुंदर ज्वारा को नगद राशि देकर सम्मानित किया। उनके गांव में इस साल पंचायत के माध्यम से 250 नग मांरद भी खरीदे गए हैं।
महुआ की दारू का लगाते हैं भोग
आदिवासियों के इस करमा पर्व की खास बात यह है कि पूजा के दौरान गांव का बैगा करम की डंगाल पर महुआ से बनी शराब प्रसाद के रूप में चढ़ाता है। यही कारण है कि महुआ शराब आदिवासियों की संस्कृति से जुड़ा हुआ है।