
Ram Vanagaman Path : कसडोल। पांच अगस्त को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का शिलान्यास करेंगे। जिसके बाद राम मंदिर का निर्माण प्रारंभ हो जाएगा। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के आदेश जारी होने के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने भी राज्य में राम वनगमन पथ के महत्वपूर्ण स्थलों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का फैसला किया है। तुरतुरिया को लवकुश की जन्मभूमि के साथ ही इस क्षेत्र को प्रभु श्रीराम का ननिहाल के नाम से भी जाना जाता है, साथ ही प्रभु श्रीराम ने वनगमन के दौरान लगभग 75 स्थलों का भ्रमण किया। जिसमें से 51 स्थल ऐसे हैं, जहां श्री राम ने भ्रमण के दौरान रुककर कुछ समय बिताया था। छत्तीसगढ़ सरकार ने राम वनगमन स्थलों में पर्यटन की दृष्टि से बलौदाबाजार जिले के माता गढ़ तुरतुरिया को शामिल किया गया है। प्रस्तावित स्थलों का वन विभाग के अनुसार वहां पहुंच मार्ग का उन्नयन, पर्यटक सुविधा केंद्र, वैदिक विलेज, पगोड़ा, मूलभूत सुविधा, वाटर फ्रंट डेवलपमेंट, विद्युतीकरण सहित अन्य कार्य कराए जाएंगे।
रामायण कालीन संस्कृति मौजूद
छत्तीसगढ़ में रामायणकालीन संस्कृति की झलक आज भी देखने को मिलती है। जिससे यह साबित तो होता है कि भगवान श्रीराम के अलावा माता सीता और लव-कुश का संबंध भी इसी प्रदेश से था। घने जंगलों के बीच स्थित माता गढ़ तुरतुरिया में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम इसी बात की याद दिलाता है कि रामायण काल में छत्तीसगढ़ का कितना महत्व रहा होगा। जनश्रुतियों के अनुसार त्रेतायुग में यहां महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था और उन्होंने सीताजी को भगवान राम द्वारा त्याग देने पर आश्रय दिया था। तुरतुरिया सिरपुर-कसडोल मार्ग पर ठाकुरदिया नाम स्थान से सात किलोमीटर की दूरी पर घने जंगल और पहाड़ों पर स्थित है। यह छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 113 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसी क्षेत्र में महादेव शिवलिंग भी मिलते हैं, जो 8वीं शताब्दी के हैं। यहीं पर माता सीता और लव-कुश की एक प्रतिमा भी नजर आती है, जो 13-14 वीं शताब्दी की बताई जाती है।
जर्जर सड़क पर्यटकों के लिए बनता है परेशानी
लवन रेंज अंतर्गत तुरतुरिया मातागढ़ का एरिया आता है, जहां पहुंचने के लिए केवल एक मात्र सड़क है जो इस समय काफी जर्जर है। जगह जगह से पत्थर और बोल्डर दिख रहे हैं। साथ ही सिरपुर और कसडोल मुख्यमार्ग के ठाकुरदीया से अंदर आने वाला एक मात्र मुख्य सड़क कई जगहों से घुमावदार होने के साथ ही 4 से 5 जगहों से मिट्टी के क्षार से कटा हुआ है जिसके कारण आने वाले पर्यटक और श्रद्घालुओं को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। फिलहाल तुरतुरिया को अब छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा पर्यटन स्थल घोषित करने के बाद अब इस क्षेत्र का विकास सम्भावित है।
इसलिए पड़ा तुरतुरिया नाम
इस पर्यटन स्थल का नाम तुरतुरिया पड़ने के पीछे भी एक कहानी बताई जाती है। ग्रामीण बताते हैं कि कोई 200 वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के एक संत कलचुरी कालीन राजधानी माने जाने वाले स्थल पहुंचे। घने वनों से आच्छादित व पहाड़ियों से घिरे इस स्थल पर पहाड़ों का जल वर्षभर लगातार एक धार के रूप में बहता था। जिससे तुर-तुर की आवाजें निकलती थीं। बताया जाता है कि इसी तुर-तुर की आवाजों के कारण संत ने इस स्थान का नाम तुरतुरिया रख दिया जो आज भी प्रचलन में है। यह स्थान रामचरित मानस में भी (त्रेतायुग) उल्लखित है।
आश्रम में अश्वमेध के साथ लवकुश की मूर्ति मौजूद
वाल्मीकि आश्रम में ही लव कुश की एक मूर्ति घोड़े को पकड़े खड़े रहने की है। ये मूर्ति यहां खोदाई के दौरान मिली है। मंदिर के पुजारी पंडित रामबालक दास के अनुसार लव-कुश जिस घोड़े को पकड़े हैं वह अश्वमेघ का घोड़ा है। ये मूर्तियां ही भगवान राम एवं सीता के यहां प्रवास का प्रमाण माना जाता है।
वर प्राप्ति के लिए बालमदेही नदी का विशेष महत्व
मंदिरों के आसपास एक विशाल नदी बहती है। इस नदी को बलमदेही नदी के रूप में जाना जाता है। ग्रामीणों के अनुसार यहां कोई कुंआरी कन्या यदि वर की कामना करती है तो उसे अच्छा वर शीघ्र ही मिल जाता है। इसकी इसी चमत्कारिक खासियत के कारण इसका नाम (बालम=पति, देहि=देने वाला) बलमदेही पड़ा।
प्राचीन प्रतिमाएं हैं मौजूद
सन 1914 में ब्रिटिश शासनकाल में तत्कालीन अंग्रेज कमिश्नर एचएम लारी ने इस स्थल का महत्व समझने के लिए यहां खोदाई करवाई थी। इस दौरान यहां अनेक मंदिर व सदियों पुरानी पुरातत्व महत्व की मूर्तियां मिली थी। यहां छठवी से आठवीं शताब्दी के बीच के शिवलिंग भी खोदाई के दौरान मिले थे। सीता एवं लव-कुश की खड़ी शिला भी खुदाई में मिली थी। जिससे राम-सीता के यहां आने रहने के प्रमाण मिलते हैं।
गौमुख कुंड से लगातार हो रहा जल का प्रवाह
तुरतुरिया वाल्मीकि आश्रम प्रवेश करते ही एक गौमुख कुंड दिखाई देता है। इस गौमुख से लगातार ताजा पानी इस पर बने कुंड में गिरता रहता है। इसी पानी मे दर्शनार्थी स्नान करते हैं। बताया जाता है कि गौमुख से निकलने वाली जलधारा पूरे वर्ष भर एक ही रफ्तार से निकलती रहती है। इसलिए यहां कभी गर्मियों में भी पानी की कमी नहीं होती। वैज्ञानिक लिहाज से ये जल आसपास घिरे वररंगा पहाड़ी से अनवरत बहती है। जिसे गोमुख बना कर एक ही स्थान पर एकत्र किया गया है।
12 से 14 वर्ष तक यहीं रहीं थीं माता सीता
वाल्मीकि आश्रम तुरतुरिया के पुजारी रामबालक दास का कहना है कि 12 से 14 वर्ष तक माता सीता यहां रही हैं। लव कुश के बड़े होने पर युद्घ होने के बाद वाल्मीकिजी से मिलकर अयोध्या में यज्ञ होने के बाद सम्मिलित हुईं। पांच अगस्त को अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास होना काफी खुशी की बात है, मैंने भी सुना है कि रामवनगमन पथ के तहत तुरतुरिया को पर्यटन में चुना गया है लेकिन अभी यहां कुछ बना नहीं है और न ही कुछ बिगड़ा है। आप जैसा देख रहे है वैसा ज्यो का त्यों है।
वाल्मीकि आश्रम में कोई सुविधा नहीं
जानकार अविनाश मिश्रा ने कहा कि तुरतुरिया में वाल्मीकि आश्रम है, जहां पर किसी तरह की कोई सुविधा नहीं है। छत्तीसगढ़ सरकार ने रामवनगमन पथ के तहत पर्यटन में शामिल किया गया है उसके लिए धन्यवाद। अब सरकार को वहां विशेष सुविधा के साथ पुलिस चौकी और तमाम सुविधा देने की आवश्यकता है, क्योंकि वहां 200 से 300 प्रतिदिन पर्यटक पहुंचते हैं।
अभी तुरतुरिया मार्ग में पौधारोपण किया गया है। साथ ही तुरतुरिया के संपूर्ण विकास के लिए कार्ययोजना तैयार की जा रही है। शासन स्तर पर बैठक हो चुकी है, प्रस्ताव लिए जा रहे हैं। -यूएस ठाकुर, एसडीओ, वन विभाग कसडोल