
बलौदाबाजार। जिला मुख्यालय से करीब 15 किमी दूर ग्राम पंचायत देवरी में पुरातत्व विभाग द्वारा की जा रही खुदाई में 5वीं सदी से लेकर 12वीं सदी तक की ईंटेंए भवन के भग्नावशेष और अन्य ऐतिहासिक वस्तुएं मिली हैं। कुल ढ़ाई हजार की आबादी वाले इस गांव की मिट्टी ने अपने अंदर सैकड़ों वर्षों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक साक्ष्यों को छिपा रखा था, जिसे अब पुरातत्वेत्ता खोद-खोद कर निकाल रहे हैं।
इस तरह सामने आया इतिहास
गांव के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में अधिष्ठात्री देवी मां महामाया का निवास स्थान है जो आसपास के स्थान से कुछ ऊंचा है। इसी के पास से वर्षों से कई प्रकार की प्राचीन प्रतिमाएं प्राप्त होती रही हैं। इसी कारण गांव के कुछ लोगों को लगा कि हो न हो यहां किसी जमाने में रखा हुआ खजाना होगा और इस प्रकार चोरी-छिपे खुदाई और चोरी का सिलसिला चल पड़ा। गांव के कुछ सयाने और बुजुर्गों की पहल पर चोरी की बात थाने तक पहुंची और चूंकि उस समय पास में डमरू में खुदाई का कार्य चल रहा था अतः तात्कालीन थानेदार ने वहां पहुंच पुरातत्व विभाग के लोगों से स्थल निरीक्षण करने की बात कही। इस तरह बात पुरातत्व विभाग तक बात पहुंची। पुरातत्व विभाग ने खुदाई का प्रस्ताव पहले राज्य फिर केन्द्र सरकार को भेजकर प्रशासनिक मंजूरी ली। यहां 15 मई से खुदाई का कार्य प्रारंभ किया गया।
मंदिरों का समूह रहा होगा
प्राप्त वस्तुओं भग्नावशेषों के आधार पर पुरातत्वविद डॉ. वृषोतम साहू खनन निदेशक व योगेश साहू खनन सुपरवाइजर का कहना है कि इस स्थान पर एक मंदिर नहीं वरन मंदिरों का समूह रहा होगा, और इसी बात को आधार मानकर 15 बाई 15 के कुछ स्थानों को चिन्हित कर खुदाई की रही है। अब तक इस जगह पर लगभग दो फीट व्यास का ग्रेनाइट पत्थर से बना शिवलिंगविहीन जलहरी तथा एक प्राचीन बलुआ पत्थर का लगभग चार फीट व्यास का जलहरी प्राप्त हुआ है, जिसे चोरों ने कुछ पाने की आस में तीन चार टुकड़ों में तोड़ दिया है। दो छोटे मंदिरों के गुंबद और कुछ प्राचीन कलाकृति के साथ डेढ़ फीट लंबाई और नौ से दस इंच चौड़ाई की पांचवी सदी की ईंटें प्राप्त हुई हैं। इसी के साथ एक नवग्रह की खंडित पाषाण प्रतिमा भी प्राप्त हुई है।
बालार्जुन ने शुरू कराया था ईंटों से निर्मांण का प्रचलन
उल्लेखनीय तथ्य है कि लाल ईंटों के मंदिरों के निर्माण का कार्य सिरपुर के तात्कालिन सम्राट बालार्जुन 595-655 ई. ने किया और उनका प्रभाव क्षेत्र आज के रायपुर, बलौदाबाजार, बिलासपुर, तथा रायगढ़ तक था। देवरी में मिली ईंटों के मंदिर समूह को भी इसी क्रम में जोड़कर देखा जा रहा है। वहीं कालांतर में रतनपुर के हैहयवंशीय कल्चुरी शासक राजा रत्नदेव के अधीन भी यह क्षेत्र रहा। अतः बहुत सी कल्चुरी कालीन पत्थर की प्रतिमाएं भी यहां खुदाई के पहले और बाद में मिलती रही हैं, जिसका सबसे बड़ा प्रमाण ग्रामीणों द्वारा महामाया मंदिर के भीतर सहेज कर रखी गई विष्णु की पांच प्रतिमाएं हैं, जो आज भी अच्छी स्थिति में हैं।
इतिहास को सहेजने के लिए संग्रहालय की दरकार
ग्राम देवरी में खुदाई का प्रस्ताव जुलाई में दिया गया था, सितंबर में लाइसेंस मिला और 15 मई को काम शुरू हुआ। यदि कार्य सितंबर-अक्टूबर में प्रारंभ हो जाता तो अब तक खुदाई के बाद संग्रह और प्राप्त मंदिरों की दीवारों की जोड़ाई और बाउंड्री का काम हो जाता। यहां महाशिवरात्रि में तीन दिन का मेला लगता है। तुरतुरिया, मदकूद्वीप, डमरू और अब देवरी में मिले अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए संग्रहालय की आवश्यकता है। इसी तर्ज पर ग्राम कोनारी, गिन्दोला व अन्य जगहों पर सम्यक खुदाई की आवश्यकता है।
इनका कहना है
छत्तीसगढ़ के पुरातत्व इतिहास को समझने में यह खुदाई मील का पत्थर साबित होगी। इस खुदाई की समय सीमा 31 जुलाई तक समाप्त हो जाएगी क्योंकि कुछ ऐतिहासिक धरोहर इस खुदाई में मिलने की संभावना है इसलिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण नई दिल्ली से अनुमति लेकर फिर दोबारा खुदाई की जाएगी।
- राकेश चतुर्वेदी, संचालक पुरातत्व विभाग बलौदाबाजार।