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बस्तर के बड़े बोदल में पादरियों का प्रवेश प्रतिबंधित, ग्रामसभा ने पेसा कानून का हवाला देकर लिया निर्णय

बस्तर जिले के नानगुर क्षेत्र अंतर्गत बड़े बोदल गांव में ग्रामसभा ने आदिवासी संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण का हवाला देते हुए पादरियों के प्रवेश और बा...और पढ़ें

By Vinod SinghEdited By: Paritosh Dubey
Publish Date: Thu, 15 Oct 2026 03:13:36 PM (IST)Updated Date: Thu, 15 Oct 2026 03:14:49 PM (IST)
बस्तर के बड़े बोदल में पादरियों का प्रवेश प्रतिबंधित, ग्रामसभा ने पेसा कानून का हवाला देकर लिया निर्णय
गांव के प्रवेश द्वार पर पादिरयों के प्रवेश प्रतिबंधित बोर्ड के पास खड़े ग्रामीण। -ग्रामीण

HighLights

  1. बड़े बोदल में पादरियों के प्रवेश पर रोक
  2. ग्रामसभा ने दिया पेसा कानून का कड़ा हवाला
  3. परंपरा बनाम धार्मिक स्वतंत्रता पर छिड़ी बहस

नईदुनिया प्रतिनिधि, जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में मतांतरण को लेकर जारी सामाजिक और प्रशासनिक खींचतान के बीच नानगुर क्षेत्र के ग्राम बड़े बोदल से बड़ा मामला सामने आया है। गांव की ग्रामसभा ने प्रस्ताव पारित कर पादरियों के प्रवेश और बाहरी धार्मिक प्रार्थना सभाओं पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। इस निर्णय के बाद गांव के प्रमुख स्थल अटल चौक पर एक विस्तृत सूचना बोर्ड भी लगा दिया गया है।

ग्रामसभा ने अपने इस कदम को आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान, रूढ़िगत मान्यताओं और पारंपरिक आस्था की रक्षा के लिए आवश्यक करार दिया है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा के विशेषाधिकारों और भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के बीच कानूनी संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है।


अटल चौक पर लगा सूचना पटल, पूर्व अनुमति अनिवार्य

ग्रामीणों द्वारा गांव के अटल चौक पर स्थापित बोर्ड में स्पष्ट किया गया है कि ग्राम क्षेत्र के भीतर किसी भी प्रकार की बाहरी धार्मिक गतिविधि या प्रार्थना सभा आयोजित करने से पहले ग्रामसभा से विधिवत अनुमति लेना अनिवार्य होगा। बिना पूर्व स्वीकृति धर्म प्रचारकों, पादरियों के प्रवेश और किसी भी प्रकार के सामूहिक धार्मिक आयोजनों पर रोक रहेगी। सूचना पटल पर छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम के प्रमुख कानूनी प्रावधानों का भी उल्लेख किया गया है, ताकि गैर-कानूनी ढंग से प्रलोभन या दबाव के जरिए कराए जाने वाले मतांतरण पर अंकुश लगाया जा सके।

पेसा कानून के तहत अधिकारों का दावा

ग्रामसभा ने अपने प्रस्ताव का वैधानिक आधार पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम यानी 'पेसा कानून' को बताया है। पेसा कानून देश के अनुसूचित जनजातीय क्षेत्रों में ग्रामसभा को स्थानीय परंपराओं, रीति-रिवाजों, सांस्कृतिक धरोहरों और सामुदायिक संसाधनों के संरक्षण व प्रबंधन का व्यापक अधिकार प्रदान करता है। ग्रामीणों और स्थानीय आदिवासी संगठनों का तर्क है कि बाहरी धार्मिक गतिविधियों से गांव का सामाजिक ताना-बाना और सदियों पुरानी स्थानीय देव परंपराएं प्रभावित हो रही हैं, इसलिए उनका नियमन ग्रामसभा के अधिकार क्षेत्र में आता है।

संविधान का अनुच्छेद 25 बनाम ग्रामसभा के अधिकार

हालांकि, इस प्रकार के प्रतिबंधों की वैधानिकता को लेकर विधि विशेषज्ञों के बीच राय बंटी हुई है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 देश के प्रत्येक नागरिक को अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा अपने धर्म को मानने, आचरण करने और शांतिपूर्ण प्रचार करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। हालांकि यह अधिकार लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। ऐसे में कानूनी सवाल यह उठता है कि क्या पेसा कानून के तहत ग्रामसभा के पास किसी नागरिक या धार्मिक प्रतिनिधि के आवागमन और व्यक्तिगत धार्मिक आचरण पर प्रत्यक्ष रोक लगाने का वैधानिक अधिकार है।

प्रशासनिक सतर्कता और कानूनी परीक्षण की दरकार

गांव में बोर्ड लगने के बाद क्षेत्र में तनाव न फैले, इसके लिए प्रशासनिक निगरानी की आवश्यकता महसूस की जा रही है। अधिकारियों और विधि जानकारों का मानना है कि इस पूरे प्रकरण में ग्रामसभा के प्रस्ताव और बोर्ड पर उल्लिखित कानूनी दावों का विधिक परीक्षण कराया जाना जरूरी है। स्थानीय स्तर पर शांति और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के लिए संवाद के जरिए ऐसे समाधान की जरूरत है, जिसमें जनजातीय अस्मिता की रक्षा भी हो और संवैधानिक मर्यादाओं का भी उल्लंघन न हो।