
नईदुनिया, प्रतिनिधि, जगदलपुर। बीस साल का फासला मिटा, तो पुरखों की परंपराओं से फिर जुड़ने के लिए महारा परिवार के 10 सदस्य आगे आए। शुक्रवार को सोनारपाल गांव में उनकी घर वापसी पर नाइक-पाइक, समाज के पदाधिकारी और ग्रामीण स्वागत के लिए जुटे। पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच यह केवल एक परिवार की वापसी नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से फिर जुड़ने का अवसर था।
बस्तर में आस्था का रिश्ता केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है। ग्राम देवी-देवता, देवगुड़ियां, प्रकृति और पुरखों से मिली मान्यताएं पीढ़ियों को जोड़ती हैं। इन्हीं परंपराओं से गांव का सामूहिक जीवन और सांस्कृतिक पहचान बनती है। महारा परिवार की वापसी ने दो दशक बाद इसी जुड़ाव को फिर महसूस करने का मौका दिया।
लेकिन बीते कुछ वर्षों में इसी पहचान को लेकर बस्तर के कई गांवों में तनाव भी बढ़ा है। जनजातीय समाज के एक वर्ग का आरोप है कि मतांतरण के बाद कुछ परिवार पारंपरिक रीति-रिवाजों और सामुदायिक नियमों से दूर हो गए। कई गांवों में देवगुड़ियों के साथ चर्च बनने और पूजा के तरीकों में बदलाव से मतभेद गहरे हुए। कहीं गांव दो हिस्सों में बंट गए, तो कहीं शव दफनाने और सामाजिक रीति-रिवाजों को लेकर विवाद सामने आए।
परंपरागत व्यवस्था को बचाने की मांग के बीच नारायणपुर के एड़का सहित बस्तर के कई गांवों में टकराव की स्थिति बनी। एड़का में मतांतरण से जुड़े विवाद के दौरान पुलिस अधीक्षक पी. सदानंद के सिर में चोट लगने की घटना ने इस मुद्दे की गंभीरता को सामने ला दिया।
बस्तर और आसपास के इलाकों में पिछले छह महीने के दौरान अलग-अलग गांवों से घर वापसी की घटनाएं सामने आई हैं। मई में अबूझमाड़ क्षेत्र में आठ परिवारों की वापसी हुई थी। जुलाई में कुलगांव में सात सदस्य, अगस्त में नेलेगोंदी में 12 लोग और चिड़पाल में एक परिवार के सात सदस्य पुरानी परंपराओं में लौटे। सितंबर में छोटे बोदल में चार लोग, कांकेर जिले में तीन परिवारों के 18 सदस्यों और सुलियागुड़ा पारा में छह सदस्यों की घर वापसी हुई। अब सोनारपाल के 10 सदस्यों ने पुरखों की परंपराएं फिर अपनाईं।
छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज पारंपरिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान के प्रति जागरूकता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। समाज के प्रदेश अध्यक्ष राजाराम तोड़ेम पारंपरिक देवी-देवताओं और विरासत से जुड़ाव मजबूत करने पर जोर देते हैं। वहीं, जिलाध्यक्ष दशरथ कश्यप का दावा है कि धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026 लागू होने के बाद मतांतरण की घटनाओं में कमी आई है और लोग अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 2026 को 10 जुलाई से लागू किया गया। इसने 1968 के पुराने कानून की जगह ली। इसका मकसद बल, धोखाधड़ी, लालच या गलत तरीके से धर्म परिवर्तन पर रोक लगाना है। सरकार के मुताबिक, पुराने कानून में अवैध मतांतरण रोकने के लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं थे।