नवागढ़ (नईदुनिया न्यूज)। नगर समेत ग्रामीण अंचलों में कमरछठ त्योहार धूमधाम से मनाया गया। संतान की लंबी उम्र के लिए माताओं ने विधि विधान से पूजा की। इस त्योहार को सफल बनाने में आवश्यक पूजन सामाग्री को उपलब्ध कराने में श्रीवास समुदाय का विशेष योगदान रहता है। नवागढ़ के शंकर नगर निवासी 22 वर्षीय महेश श्रीवास ने बताया कि कमरछठ त्योहार के हफ्तेभर पहले पूजा में लगने वाले आवश्यक सामान जैसे महुआ का दातुन, दोना, पतरी एकत्रित करने की शुरुआत कर दी है।

छह हजार रुपये की आमदनी हुई

उन्होंने बताया कि उनके घर से इस काम में दो लोग नियमित रुप से लगे रहते है, तब जाकर कमरछठ से पहले व्रत रखने वाली माताओं के लिए आवश्यक पूजन सामग्री उपलब्ध होता है। इस बार के कमरछठ त्योहार में उनके परिवार ने तकरीबन 300 सेट (महुआ से बना दोना, पतरी और दातुन) बेचा है। जिससे उन्हें छह हजार रुपये की आमदनी हुई। महेश श्रीवास ने बताया कि महुआ के पत्ते से दोना, पतरी बनाना चुनौतीपूर्ण काम है। कठिन परिश्रम के बावजूद उन्हें उनके काम का उचित दाम नहीं मिल पाता है। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उनके समुदाय के लोग अपने काम को बखूबी अंजाम देते हैं।

महुआ पत्ता के लिए करनी पड़ती है मसक्त

महेश श्रीवास ने बताया की नवागढ़ नगर के आसपास महुआ पेड़ की कमी के चलते उसके पत्ते के लिए काफी मस-त करनी पड़ती है। कमरछठ त्योहार में महुआ से बने दोना पतरी और दातुन का विशेष महत्व है। पतरी और दोना के लिए महुआ के फ्रेश पत्ते की जरुरत पड़ती है। जिसे बांस के छोटे-छोटे पतले टुकड़ो से जोड़कर दोना और पतरी बनाया जाता है। उन्होंने बताया की महुआ पत्ते की तलाश में बाइक से कई गांवों में दस्तक देते है। तब जाके पर्याप्त मात्रा में महुआ का पत्ता उपलब्ध हो पाता है।

कमरछठ पर माताओं ने बच्चों के पीठ पर पोती मारकर की दीर्घायु की कामना

कमरछठ पर बुधवार को शहर के मन्दिरों और मोहल्लों में सगरी बनाकर पूजा करने महिलाओं की भीड लगी रही। सुबह से निर्जला व्रत कर महिलाओं ने दोपहर को भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर कमरछठ की कहानी भी सुनी। इस अवसर पर माताओं ने सगरी (कुंड) बनाकर उसे सजाया भी और उसमें मिट्टी की नाव बनाकर भी छोडी। शाम को सूर्य डूबने के बाद पसहर चावल और छह तरह की भाजी व दही खाकर अपना व्रत तोडा। पूजा से लौटने के बाद माताओं ने अपने बधाों के पीठ पर पीली पोती मारकर उनके दीर्घायु की कामना की।

वही शहर के मंदिरों में कमरछठ की सामूहिक पूजा के लिए महिलाओं की भीड लगी रही। दोपहर बाद मंदिर में एक के बाद एक ग्रुप में आई महिलाओं ने पूजा की और कथा भी सुनी। जो महिलाएं मंदिर तक नहीं पहुंची उन्होंने घर के पास ही गड्ढा खोदकर सगरी बनाई और मिलकर पूजा-अर्चना की। नवागढ़ नगर के सुकुल पारा, मिश्रा पारा, बिच पारा, ब्राह्मण पारा, बावा पारा, शंकर नगर, दर्री पारा, देवांगन पारा की महिलाओं ने करमछठ की सामूहिक पूजा-अर्चना की। व्रती महिलाओ ने बताया कि संतान की लंबी उम्र के लिए यह व्रत काफी फलदायी होता है।

खाए परसहर चावल

कमरछठ के दिन महिलाओं ने बिना हल के उपजे पसहर चावल जो खेतों की मेड पर होता है उसे ग्रहण किया। साथ ही गाय के दूध, दही, घी के बदले भैंस के दूध, दही, घी का सेवन किया। उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ में कमरछठ के दिन हल को छूना तो दूर हल चली जमीन पर भी महिलाएं पैर नहीं रखती और हल चले अनाज को भी ग्रहण नहीं करती। आचार्य श्रीकांत शर्मा ने बताया कि मान्यता है कि हलषष्ठी के दिन बलराम का जन्म हुआ था और उनके दो दिन बाद जन्माष्टमी को कृष्ण का जन्म हुआ था। वही भगवान का कार्तिकेय का जन्म भी हल षष्ठी के दिन माना जाता है। बलराम को शस्त्र के रूप में हल मिला था इसलिए इसे हल षष्ठी भी कहा गया है।

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