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भिलाई इस्पात के अफसर से लेकर दुर्ग की लेखिका तक, छत्तीसगढ़ के लेखकों ने अपनी किताबों से बदला समाज का आईना

Hindi Diwas Special: भिलाई-दुर्ग में हिंदी दिवस पर 5 लेखकों की बात। कोई गांव की याद लिखता है तो कोई शहर के बदलते रूप की कहानी।

By Digital DeskEdited By: Akash Sharma
Publish Date: Mon, 14 Sep 2026 01:55:12 PM (IST)Updated Date: Mon, 14 Sep 2026 01:55:12 PM (IST)
भिलाई इस्पात के अफसर से लेकर दुर्ग की लेखिका तक, छत्तीसगढ़ के लेखकों ने अपनी किताबों से बदला समाज का आईना
हिंदी दिवस स्पेशल: भिलाई में हिंदी दिवस पर 5 लेखकों की कहानी

HighLights

  1. भिलाई-दुर्ग के 5 लेखकों ने हिंदी दिवस पर बात रखी
  2. विद्या गुप्ता बोलीं- दिल से लिखा साहित्य काम का
  3. विनोद साव की 20 से ज्यादा किताबें आ चुकी हैं

टी.सूर्याराव, नईदुनिया, भिलाई। हिंदी सिर्फ बात करने की भाषा नहीं है, ये हमारे आसपास क्या हो रहा है, लोग क्या महसूस कर रहे हैं, समाज कैसे बदल रहा है, ये सब लिखने का तरीका भी है। छत्तीसगढ़ के लेखक, कवि और व्यंग्य लिखने वाले अपनी कहानियों में गांव की मिट्टी से लेकर शहर की भागदौड़, घर के रिश्तों से लेकर समाज में चल रही गलत बातों तक को लिखते हैं।

किसी की कविता में गांव की याद आती है, तो किसी की कहानी में बदलते समाज की झलक मिलती है। कोई व्यंग्य के जरिए सिस्टम की कमी पर सवाल उठाता है, तो कोई अपनी लिखी बातों से नए लोगों को पुरानी बातों से जोड़ता है। हिंदी दिवस पर हम आपको ऐसे ही कुछ लेखकों की बात बता रहे हैं।


60 साल से हिंदी के लिए लिख रहे हैं गुलबीर सिंह भाटिया

गुलबीर सिंह भाटिया का काम हिंदी दिवस पर याद करना जरूरी है। उनका जन्म 1 जनवरी 1946 को रावलपिंडी में हुआ था। वे पिछले 60 साल से हिंदी और पंजाबी में लगातार लिख रहे हैं। ‘बंद खिड़कियों का प्यार’ उनका कविता संग्रह है और ‘मछली का मायका’ कहानी संग्रह है। ये दोनों किताबें काफी पढ़ी गई हैं।

उन्होंने पंजाबी लेखक गुलजार सिंह संधू की किताब ‘ध्रुव तारे’ का हिंदी में अनुवाद भी किया है। उनकी कई कहानियों का बंगला, असमिया और मराठी जैसी भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है। भाटिया के लिखने का तरीका ये है कि वे आज की जिंदगी में जो परेशानियां हैं, लोगों के बीच के रिश्ते, महिलाओं पर होने वाले जुल्म और लोगों की मजबूरी को बहुत करीब से लिखते हैं। वे सिर्फ कहानी नहीं लिखते, उस दर्द को महसूस भी करते हैं। छोटे शहरों में लोग कैसे रहते हैं, कैसे काम करते हैं, इसको वे अपनी कहानियों में बहुत अच्छे से दिखाते हैं।

कवि का मन गांव की ओर जाता है, व्यंग्य में समाज की सच्चाई

कवि और व्यंग्य लिखने वाले रवि श्रीवास्तव की रचनाओं में गांव, घर-परिवार और हमारे आसपास जो बदलाव हो रहा है, वो साफ दिखता है। उनका मन कविता लिखते हुए बार-बार गांव की यादों में चला जाता है। उनकी कविताओं की सबसे बड़ी बात है कि वो सीधे दिल तक पहुंचती हैं और बिना डरे अपनी बात कहती हैं।

छत्तीसगढ़ के लोगों के बीच रहने की वजह से उनकी लिखी बातों में यहां की संस्कृति और लोगों का अपनापन दिखता है। उनकी कविताओं में आम आदमी की लड़ाई और समाज में जो बदलाव आ रहा है, उसे आप महसूस कर सकते हैं। व्यंग्य लिखते हुए रवि श्रीवास्तव आज के हालात पर तेज नजर रखते हैं।

वे सिर्फ नेता या राजनीति पर ही नहीं, बल्कि समाज में जो दिखावा है, लोगों के बीच जो फर्क है, उस पर भी लिखते हैं। उनका जन्म राजिम के पास कोमा गांव में हुआ है। वे भिलाई इस्पात संयंत्र के शिक्षा विभाग में अफसर थे और वहीं से रिटायर हुए हैं। उनकी दो कविता की किताबें और दो व्यंग्य की किताबें छप चुकी हैं।

दिल से लिखा गया साहित्य ही समाज को रास्ता दिखाता है

लेखिका विद्या गुप्ता कहती हैं कि लिखने वाले का समाज के लिए बड़ी जिम्मेदारी होती है। उनके हिसाब से जब आप जिंदगी को दिल से जीते हैं और महसूस करते हैं, तभी अच्छा लिख सकते हैं। उसी अनुभव से ऐसा लिखा जा सकता है जो समाज की सच्ची तस्वीर भी दिखाए और लोगों को सही रास्ता भी बताए।

विद्या गुप्ता का जन्म उज्जैन, मध्यप्रदेश में हुआ है, लेकिन अब वे दुर्ग में रहती हैं। वे सभी तरह की विधाओं में लिखती हैं। उनकी किताबों में और कितनी दूर, पारदर्शी होते हुए, मैं हस्ताक्षर हूं, हम बीस सदी के और छत्तीसगढ़ की लेखिकाएं शामिल हैं। वे कहती हैं कि वही लिखना काम का है जिसमें लेखक लोगों के सुख-दुख को अपने दिल से महसूस करके लिखे। निराला की सरोज स्मृति, वह तोड़ती पत्थर और भिक्षुक जैसी कविताएं इसी तरह की हैं। आज लिखने वालों से भी यही उम्मीद है कि उनकी हर रचना लोगों को नया सोचने पर मजबूर करे।

बदलते समय की कहानी लिखते हैं परदेशी राम वर्मा

परदेशी राम वर्मा की कहानियां पिछले 60 साल में समाज कैसे बदला है, उसकी कहानी कहती हैं। वे बताते हैं कि उन्होंने चिमनी और कंडील की रोशनी से लेकर बिजली की रोशनी तक समाज को बदलते देखा है। रायपुर और भिलाई से उनका बचपन से नाता है, इसलिए उन्होंने गांव और शहर दोनों को बदलते हुए देखा है।

वे कंगला मांझी के समय को याद करते हैं, जब उनके सिपाहियों को पुलिस की मार और बेइज्जती सहनी पड़ती थी। आज उसी आदिवासी समाज से विष्णुदेव साय मुख्यमंत्री हैं। सिर पर मैला ढोने जैसी बुरी परंपरा अब खत्म हो गई है। कारखाने लगे, पढ़ाई बढ़ी, प्राइवेट नौकरियां आईं और लोगों के रहने का तरीका बदला। महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है और अलग जाति में शादियां भी ज्यादा होने लगी हैं। लेकिन वर्मा जी कहते हैं कि धर्म के नाम पर अंधविश्वास, दिखावा, समाज में झगड़े और राजनीति में पैसे का लालच अभी भी चिंता की बात है।

अपनी किताबों से हिंदी को आगे बढ़ा रहे हैं विनोद साव

हिंदी दिवस पर व्यंग्य लेखक विनोद साव का काम भी खास है। वे व्यंग्य, कहानी और घूमने के किस्से लिखते हैं। इससे समाज, हमारी संस्कृति और बदलते समय की तस्वीर सामने आती है।

अब तक उनकी 20 से ज्यादा किताबें छप चुकी हैं। इनमें उपन्यास, व्यंग्य, कहानी, अपने बारे में लिखी बातें और यात्रा के किस्से हैं। चुनाव, भोंगपुर-30 किलोमीटर, मैदान-ए-व्यंग्य, हार पहनाने का सुख और मेनलैंड का आदमी उनकी पढ़ी जाने वाली किताबें हैं। उनकी रचनाएं हंस, पहल, वसुधा, ज्ञानोदय और वागर्थ जैसी बड़ी पत्रिकाओं में छपी हैं। उन्हें वागीश्वरी, सप्तपर्णी और अट्टहास सम्मान मिल चुका है। घूमना-फिरना उनके लिखने की खास पहचान है। वे भिलाई इस्पात संयंत्र के सीएसआर विभाग में सहायक मैनेजर थे और आज भी हिंदी के लिए लगातार लिख रहे हैं।