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11 वार्ड वाले पटरीपार से भिलाई चरोदा निगम को मिलता रहा है नेतृत्व, फिर भी विकास की आस अधूरी

भिलाई-चरौदा नगर निगम में 11 वार्डों वाले पटरीपार क्षेत्र ने लगातार पांच कार्यकालों से नगर की कमान संभाली, लेकिन इसके बावजूद यह क्षेत्र विकास के मामले में आज भी पिछड़ा है।

By Mahendra Kumar SahuEdited By: Manoj Kumar Tiwari
Publish Date: Tue, 03 Nov 2026 06:24:56 PM (IST)Updated Date: Tue, 03 Nov 2026 06:24:56 PM (IST)
11 वार्ड वाले पटरीपार से भिलाई चरोदा निगम को मिलता रहा है नेतृत्व, फिर भी विकास की आस अधूरी
पांच कार्यकाल में तीन नगर पालिका अध्यक्ष और दो महापौर पटरीपार के ग्रामीण क्षेत्रों से चुने गए

HighLights

  1. भिलाई-चरौदा निगम में 11 वार्डों वाले पटरीपार से चुने गए सभी महापौर।
  2. 5 कार्यकालों से सत्ता की कमान संभालने के बावजूद क्षेत्र विकास में पिछड़ा।
  3. आगामी चुनावों में 40 वार्डों के समान विकास पर उठे बड़े सवाल।

नईदुनिया , भिलाई : भिलाई चरोदा नगर निगम की राजनीति में एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। निगम के कुल 40 वार्डों में से रेलवे लाइन के इस पार यानी पटरीपार क्षेत्र में केवल 11 वार्ड हैं, जबकि रेलवे लाइन के दूसरी ओर 29 वार्ड आते हैं। इसके बावजूद नगर पालिका से लेकर नगर निगम तक के पांच कार्यकालों में नेतृत्व की कमान लगातार पटरीपार क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों के हाथों में रही है। तीन बार नगर पालिका अध्यक्ष और दो बार महापौर इसी क्षेत्र से चुने गए। लेकिन विडंबना यह है कि जिस क्षेत्र ने नगर की राजनीतिक अगुवाई की, विकास के मामले में वही क्षेत्र अपेक्षाकृत पीछे रह गया।

भिलाई चरोदा की पुरानी राजनीतिक व्यवस्था पर नजर डालें तो सबसे पहले वर्तमान सांसद विजय बघेल नगर पालिका अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे। वे उरला निवासी थे। इसके बाद शशिकांत बघेल ने नगर पालिका अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। वे भी उरला निवासी थे। दोनों ही निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीतकर अध्यक्ष बने थे। इसके बाद गनियारी निवासी सीता साहू नगर पालिका अध्यक्ष चुनी गईं। नगर पालिका से नगर निगम बनने के बाद देवबलोदा निवासी चंद्रकांता मांडले महापौर बनीं। वहीं वर्तमान में महापौर निर्मल कोसरे भी गनियारी क्षेत्र से आती हैं।


इस तरह पांचों कार्यकाल में नेतृत्व पटरीपार के ग्रामीण इलाकों से ही चुना गया। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो 11 वार्डों वाला यह छोटा क्षेत्र 29 वार्डों वाले दूसरे हिस्से पर नेतृत्व के मामले में भारी पड़ता रहा है। हालांकि इस राजनीतिक प्रतिनिधित्व का दूसरा पहलू भी है। आमतौर पर लोगों की अपेक्षा रहती है कि जब उनके क्षेत्र का कोई जनप्रतिनिधि नगर पालिका अध्यक्ष या महापौर जैसे महत्वपूर्ण पद पर पहुंचेगा तो उस क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं को प्राथमिकता मिलेगी। सड़क, नाली, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था, सफाई और अन्य नागरिक सुविधाओं का विस्तार होगा। लेकिन पटरीपार के ग्रामीण वार्डों में विकास की स्थिति को लेकर अब भी सवाल उठते रहे हैं।

नेतृत्व मिला, लेकिन विकास की अपेक्षा अधूरी

पटरीपार क्षेत्र की राजनीतिक उपलब्धि और विकास की स्थिति के बीच का अंतर इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। यहां के लोगों ने लगातार अपने क्षेत्र से अध्यक्ष और महापौर चुनकर नगर की बागडोर सौंपी, लेकिन इसका लाभ क्षेत्र के समग्र विकास के रूप में कितना मिला, इस पर चर्चा जरूरी है। नेतृत्व मिलने के बावजूद यदि सड़क, नाली, पेयजल और दूसरी मूलभूत सुविधाओं के लिए लोगों को इंतजार करना पड़ रहा है तो यह स्थानीय निकाय के कामकाज की समीक्षा का विषय है।

आगामी चुनाव में केवल यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं होगा कि महापौर पटरीपार से बनेगा या रेलवे लाइन के दूसरी ओर से, बल्कि असली सवाल यह भी रहेगा कि अगला नेतृत्व पूरे 40 वार्डों को समान विकास की दृष्टि से देखेगा या नहीं। आखिर महापौर किसी एक क्षेत्र का नहीं, बल्कि पूरे नगर निगम का प्रतिनिधि होता है। पटरीपार के लोगों के लिए भी अब राजनीतिक नेतृत्व के साथ विकास का हिसाब मांगने का समय है।

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