नईदुनिया प्रतिनिधि, भिलाई। भारत और रूस की मित्रता के प्रतीक और दोनों के बीच मौजूद फौलादी संबंधों की इस्पाती संरचना भिलाई स्टील प्लांट में संगठित चोरी की वारदात सामने आई थी। करीब 250 टन स्क्रैप चोरी के इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई है। चोरी का यह मामला 26 मई को अकलोरडीह और हथखोज स्थित गोदामों में छापेमारी के बाद उजागर हुआ था, जहां से 3.22 करोड़ रुपये मूल्य का स्क्रैप, मशीनरी और वाहन जब्त किए गए थे।
पुलिस की जांच में सामने आया था कि फ्लाई ऐश की आड़ में संयंत्र से स्क्रैप निकालकर निजी औद्योगिक इकाइयों में खपाया जा रहा था। पुलिस ने अब तक बीएसपी के निलंबित जीएम, कर्मियों, ट्रांसपोर्टरों और एक निजी स्टील कंपनी के निदेशकों सहित कुल 21 आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है। विधायक रिकेश सेन की मांग पर शुरू हुई सीबीआई जांच से अब इस पूरे सिंडिकेट, सुरक्षा खामियों और वित्तीय कड़ियों की नए सिरे से विस्तृत पड़ताल होगी। आइए जानते हैं प्रदेश के इस गौरव के बारे में।
राष्ट्र निर्माण में है अहम भूमिका
भारत के औद्योगिक विकास और सार्वजनिक क्षेत्र के आधार स्तंभों में शुमार भिलाई इस्पात संयंत्र (BSP) छह दशकों से अधिक समय से राष्ट्र निर्माण में अपनी अग्रणी भूमिका निभा रहा है। पूर्व सोवियत संघ (अब रूस) के तकनीकी व आर्थिक सहयोग से स्थापित यह संयंत्र न केवल देश का प्रमुख इस्पात उत्पादक है, बल्कि भारतीय रेल की जीवनरेखा और सामरिक परियोजनाओं की रीढ़ माना जाता है।
10 लाख टन से शुरू हुआ उत्पादन
भारत सरकार और सोवियत संघ (रूस) के बीच 2 फरवरी 1955 को 10 लाख टन (1 मिलियन टन) क्षमता के इस्पात संयंत्र की स्थापना के ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। संयंत्र के पहले ब्लास्ट फर्नेस का उद्घाटन 4 फरवरी 1959 को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था। दुर्ग जिले के ग्रामीण अंचल में शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट आज विश्वस्तरीय औद्योगिक नगरी का रूप ले चुका है।
विस्तार और मौजूदा उत्पादन क्षमता
शुरुआती दौर से आधुनिकीकरण: 1 मिलियन टन से शुरू होकर यह क्षमता 2.5 मिलियन टन (1967) और फिर 4 मिलियन टन (1988) तक पहुंची।
वर्तमान क्षमता: लगभग 18,800 करोड़ रुपये की वृहद आधुनिकीकरण और विस्तार परियोजना (MEP) के बाद इसकी क्रूड स्टील उत्पादन क्षमता बढ़कर 70 लाख टन (7 मिलियन टन) प्रति वर्ष से अधिक हो गई है।
भविष्य की योजना: 'समन्वय-2026' और 'सेल 2030 विजन' के तहत संयंत्र की क्षमता को आगे 10.2 मिलियन टन तक विस्तारित करने की रूपरेखा पर कार्य चल रहा है।
किस ग्रेड का स्टील बनता है?
रेलवे ग्रेड इस्पात: यह भारतीय रेल के लिए विश्वस्तरीय R260 ग्रेड और मेट्रो नेटवर्क व हाई-स्पीड ट्रैक के लिए हेड-हार्डन्ड (Head-Hardened) रेल्स का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। यहां 130 मीटर लंबी रेल पटरियां और 260 मीटर तक के वेल्डेड पैनल बनते हैं।
रक्षा एवं नौसेना ग्रेड: भारतीय नौसेना के स्वदेशी युद्धपोतों व विमानवाहक पोत (जैसे आईएनएस विक्रांत) के लिए विशेष DMR 249A और DMR 249B ग्रेड की उच्च-तन्यता वाली स्टील प्लेट्स यहीं तैयार होती हैं।
संरचनात्मक व वाणिज्यिक स्टील: भूकंप-रोधी TMT बार्स (Fe 500D / 550D), 3600 मिमी चौड़ाई तक की हेवी प्लेट्स, वायर रॉड्स और औद्योगिक निर्माण के लिए हेवी स्ट्रक्चरल एंगल्स व चैनल्स।
रोजगार का मजबूत आधार
प्रत्यक्ष रोजगार: संयंत्र और इसकी खदानों (दल्ली-राजहरा व रावघाट) में लगभग 13,000 से 15,000 नियमित अधिकारी एवं कर्मचारी कार्यरत हैं।
अप्रत्यक्ष आजीविका: लगभग 20,000 से अधिक संविदा व ठेका श्रमिक तथा भिलाई-दुर्ग औद्योगिक क्षेत्र के सैकड़ों अनुषंगी व डाउनस्ट्रीम उद्योगों के माध्यम से लाखों परिवारों की आजीविका सीधे तौर पर संयंत्र से जुड़ी है।
सालाना कारोबार और बिक्री
सेल (SAIL) की सभी इकाइयों में भिलाई संयंत्र सबसे अधिक राजस्व व लाभ अर्जित करने वाला फ्लैगशिप प्लांट है। संयंत्र का वार्षिक बिक्री कारोबार (Turnover/Segment Revenue) ₹30,000 करोड़ से ₹35,000 करोड़ के बीच रहता है। भारतीय रेल, रक्षा मंत्रालय, ऊर्जा क्षेत्र और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को की जाने वाली आपूर्ति इसकी कुल बिक्री का प्रमुख हिस्सा है।