
नईदुनिया प्रतिनिधि, बीजापुर। माओवादी हिंसा से मुक्ति के बाद बस्तर को अगले पांच साल में देश का सबसे विकसित आदिवासी संभाग बनाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे शासन-प्रशासन को अंचल की पुरातात्विक संपदा के संरक्षण पर भी ध्यान देना होगा। बस्तर में शासन-प्रशासन की ओर से सबसे उपेक्षित पुरातात्विक धरोहर ही रहे हैं। माओवादी हिंसा से मुक्ति के बाद आज भी वही स्थिति जस की तस बनी हुई है।
बीजापुर जिले में लगभग 2800 वर्ग किलोमीटर में पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र और तेलंगाना सीमा तक विस्तारित इंद्रावती टाइगर रिजर्व में छिंदक नागवंश काल यानी 11वीं से 13वीं शताब्दी और इसके बाद काकतीय राजवंश के समय की सैकड़ों पाषाण प्रतिमाएं बिखरी पड़ी हैं। ये प्रतिमाएं पूरी तरह असुरक्षित हैं। बताया जाता है कि यहां बिखरी प्रतिमाओं में कुछ ऐसी दुर्लभ प्रतिमाएं हैं जो छत्तीसगढ़ के अन्य क्षेत्रों में देखने को नहीं मिलतीं। ये बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का प्रमाण हैं।
तीन दशक से अधिक समय तक इस रिजर्व क्षेत्र में माओवादियों का कब्जा था, इसलिए पुरातत्व विभाग ने कभी पुरातात्विक संपदा के संरक्षण की कोशिश ही नहीं की। कुछ अवसरों पर पुरातात्विक सर्वेक्षण की योजनाएं बनाई गईं, लेकिन माओवादियों के भय से सर्वेक्षण दलों ने रिजर्व क्षेत्र में जाने से मना कर दिया था। यही वजह है कि आज तक इन धरोहरों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण, सूचीकरण और फोटोग्राफी तक नहीं हो पाई है। अभी भी पुरातत्व विभाग इन धरोहरों के संरक्षण को लेकर मौन साधे हुए है। जबकि अब क्षेत्र में शांति स्थापित हो चुकी है।
अब जबकि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए इंद्रावती टाइगर रिजर्व में जंगल सफारी शुरू करने की जोर-शोर से तैयारी चल रही है, ऐसे में पुरातात्विक धरोहरों की चोरी न हो, इसके लिए भी ठोस नीति बनाने की जरूरत है। शांति स्थापित होने के बाद बाहरी लोगों की आवाजाही बढ़ी है और जंगल सफारी शुरू होने पर यह और बढ़ेगी। ऐसे में बिना सुरक्षा के इन अमूल्य मूर्तियों की तस्करी और अवैध हस्तांतरण का खतरा बढ़ गया है।
दुर्भाग्य से अब तक इन धरोहरों के संरक्षण के लिए ठोस प्रयास नहीं हुए हैं। जागरूकता और जानकारी के अभाव में ये प्रतिमाएं असुरक्षित हालत में पड़ी हैं। कई गांवों से प्रतिमाओं की चोरी की खबरें भी आती रही हैं। कुछ ग्रामीण इन्हें घरों में रखकर पूजा करते हैं, जो आस्था का विषय है। लेकिन कई मामलों में बाहरी तस्कर इनका सौदा कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पुरातत्व एवं संस्कृति और वन विभाग को ग्राम सभाओं के समन्वय से सर्वेक्षण, सूचीकरण, फोटोग्राफी और वैज्ञानिक संरक्षण की कार्ययोजना बनाकर संरक्षण के लिए काम करना जरूरी हो गया है। तभी बस्तर की इस ऐतिहासिक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाया जा सकेगा।
संरक्षण के साथ शोध भी जरूरीशासकीय महाविद्यालय कुटरू के सहायक प्राध्यापक मनकू कोवासी पुरातात्विक धरोहरों पर शोधकर्ता के रूप में जाने जाते हैं। उनका कहना है कि इंद्रावती टाइगर रिजर्व क्षेत्र में सैकड़ों प्रतिमाओं को देखा है जो असुरक्षित है। इनके सरंक्षण के साथ ही शोध भी जरूरी है।
- मनकू कवासी।