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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 22, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Bilaspur News: कोरबा में प्रदूषण के चलते दमा व ब्रोंकाइटिस से जूझ रही 12 प्रतिशत आबादी

Bilaspur News: कोयले की खुली खदानों और कोयले के ईंधन से चलने वाले संयंत्रों के कारण कोरबा अत्यधिक प्रदूषित है

By Yogeshwar SharmaEdited By: Yogeshwar Sharma
Publish Date: Fri, 22 Jan 2021 11:30:00 AM (IST)Updated Date: Fri, 22 Jan 2021 11:30:13 AM (IST)
Bilaspur News: कोरबा में प्रदूषण के चलते दमा व ब्रोंकाइटिस से जूझ रही 12 प्रतिशत आबादी

बिलासपुर। Bilaspur News: अत्यधिक प्रदूषण के चलते कोरबा में औद्योगिक क्षेत्र की करीब 12 प्रतिशत आबादी दमा और ब्रोंकाइटिस से ग्रस्त है। कोयले की खुली खदानों और कोयले के ईंधन से चलने वाले संयंत्रों के कारण कोरबा अत्यधिक प्रदूषित है। वातावरण में मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तत्वों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने की दिशा में उचित कदम उठाए जाने की जरूरत भी बताई गई है।

राज्य स्वास्थ्य संसाधन केंद्र (एसएचआरसी) ने अप्रैल 2020 की अपनी रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया था कि करीब 11 किलोमीटर के दायरे में कोरबा के शहरी औद्योगिक क्षेत्र में रहने वाली आबादी का 12 प्रतिशत हिस्सा अस्थमा और ब्रोंकाइटिस से जूझ रहा है। कोयला आधारित पावर प्लांटों के आसपास रहनेवाले लोगों के लिए गए नमूनों के बाद यह बात सामने आई है कि यहां के लोगों में सामान्य आबादी के मुकाबले होने वाली श्वांस की बीमारी कई गुना अधिक है। वायु में होने वाले प्रदूषण की वजह से फेफड़ों के काम करने की क्षमता कम है।


पिछले साल किए गए क्रास-सेक्शनल अध्ययन में जिले के बिजली संयंत्रों के दस किलोमीटर के दायरे में रहने वाली आबादी पर किए गए शोध की तुलना 20 किलोमीटर दूर कटघोरा की आबादी के नमूनों से की गई। निष्कर्ष में अस्थमा के लक्षणों व ब्रोंकाइटिस जैसी श्वसन संबंधी बीमारियों में काफी वृद्धि देखी गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्लांट के पास रहने वाले समूह के बीच अस्थमा में 11.79 फीसदी व ब्रोंकाइटिस में 2.96 फीसदी वृद्धि दर्ज हुई।

दोनों बीमारियों का प्रतिशत 5.46 दर्ज किया गया है। कटघोरा में इनका ग्राफ महज 0.99 फीसदी मिला। शोध के दौरान दर्री स्थित पावर प्लांट से लगी श्रमिक बस्तियों के लोगों के सैंपल लिए गए। यहां के लोग प्रदूषण से होने वाली बीमारियों से ग्रसित मिले, साथ ही चिमनीभट्ठा इलाका भी गंभीर रूप से प्रदूषण की चपेट बताया गया।

कोल डस्ट का फेफड़ों पर असर, कार्यक्षमता घटी

विश्व की दूसरी सबसे बड़ी कोयला खदान कोरबा के गेवरा में है। इस इलाके में संचालित दस संयंत्र से छह हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा। प्लांटों से निकलने वाले फ्लाई ऐश से भी लोग प्रभावित हैं। पानी, वनस्पति व जन्य जीवों पर भी असर पड़ रहा। खदान क्षेत्र में उड़ने वाली कोल डस्ट फेफड़ों पर सीधे असर कर रही है।

इससे फेफड़ों के कार्य करने की क्षमता कम हो गई है। इससे लोग पूरी क्षमता से सांस लेकर शरीर के संचालन के लिए ऑक्सीजन की जरूरी मात्रा नहीं ले पा रहे और इस तरह उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी घट गई है।

डेंजर जोन की पहचान कर निगरानी की जरूरत

जिस तरह उद्योगों की स्थापना से पहले पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन किया जाता है, उसी तरह स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव का भी आकलन किया जाना चाहिए। इस निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले स्वास्थ्य विभाग की टीम की ओर से चिन्हित इलाकों में सर्वे किया गया। वायु में प्रदूषण के कारण लोगों में अस्थमा व ब्रोंकाइटिस का प्रभाव 5.46 फीसदी अधिक है। सरकार को रिपोर्ट भेजकर डेंजर जोन की पहचान कर सतत निगरानी करने की आवश्यकता बताई गई है। वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियों के लिए एक मजबूत स्वास्थ्य प्रणाली की जरूरत है।

30 की उम्र में 20 फीसदी लोग पीड़ित

इस अध्ययन के अनुसार प्रभावित आबादी में 30 वर्ष या उससे ज्यादा की उम्र की संख्या 20 फीसदी है, जो श्वास संबंधित बीमारियों से पीड़ित हो रहे। प्रदूषण के चलते इस बढ़ती समस्या को देखते हुए गैर संचारी रोगों अंतर्गत कोरबा को क्रानिक आब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) के लिए चुना गया है।

यह योजना केवल उन शहरों के लिए लागू की गई है, जहां प्रदूषण मानक स्तर से कहीं ज्यादा है। केंद्रीय पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड की 2018 की रिपोर्ट में कोरबा को गंभीर रूप से प्रदूषित शहरों में शामिल किया गया था। तब यहां का व्यापक प्रदूषण सूचकांक 69.11 दर्ज किया गया था। वह रिपोर्ट प्रगतिनगर, जमनीपाली क्षेत्र में 73 दिन, घंटाघर के करीब 70 दिन तक प्रदूषण मापी यंत्र के जरिए आंकलन कर रिपोर्ट तैयार की गई थी।

श्रमिक वर्ग में सेहत के साथ आर्थिक मुश्किलें

ट्रकर्स-प्रवासी मजदूरों, असहाय बच्चों व आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के बीच कार्य कर रही स्वयंसेवी संस्था स्त्रोत के प्रमुख डिक्सन मसीह का कहना है कि श्रमिक परिवार सबसे ज्यादा प्रदूषण की चपेट में आ रहे। ज्यादातर मलिन बस्तियां संयंत्रों व कोयला क्षेत्रों के आस-पास हैं, जहां उनका निवास होता है। ऐसे परिवार मेहनत-मशक्कत पर निर्भर हैं। प्रदूषण के चलते बीमारियों से ग्रस्त होकर कार्य क्षमता प्रभावित हो रही, इलाज का खर्च आर्थिक समस्याएं बढाता है। उन्होंने कोयला परिवहन व आम लोगों के आवागमन के लिए अलग सड़क मार्ग की सुनिश्चिता को आवश्यकब बताया।

आक्सीडेटिव तनाव, समय पहले हो रहे उम्रदराज

श्वसन संबंधी समस्याओं के अलावा कोयले की धूल और राख का असर लोगों की त्वचा पर भी पड़ रहा है। सिटी हास्पिटल एवं सिद्दीकी स्किन क्लीनिक के डायरेक्टर डा ए सिद्दीकी (एमबीबीएस, डीपीडी) का कहना है कि खासकर महिलाओं में काले दाग, चेहरे व त्वचा संबंधी बीमारियों के मामलों में वृद्धि दर्ज की जा रही है। कोल डस्ट, कार्बन मोनो आक्साइड व कार्बन डाइ आक्साइड प्रदूषण से त्वचा में आक्सीडेटिव तनाव पडता है। आक्सीडेटिव तनाव की वजह से 31 साल की उम्र में झुर्री व कोरबा के लोगों में समय से पहले उम्रदराज दिखाई देने की समस्या उत्पन्ना हो रही है।

निर्धारित मापदंडों के कड़ाई से पालन की जरूरत

औद्योगिक मामलों के जानकार, स्वयंसेवी संस्था सार्थक के अध्यक्ष व प्रदूषण के खिलाफ जमीनी स्तर की लड़ाई का लड़ रहे लक्ष्मी चौहान ने बताया कि उच्चतम न्यायालय ने भी हाल ही में माइंस को नोटिस जारी किया गया है। ऐसे अनेक उद्योग हैं, जो निर्धारित मापदंडों को पूरा करने की बजाय लगातार अनदेखा करती आ रही हैं। दूसरी ओर उन पर निगरानी करने की जवाबदारी भी ठीक से नहीं निभाई जा रही है। संबंधित विभाग को कड़ाई से कार्रवाई करनी चाहिए, जिसके अभाव में यहां की स्थिति दिन-प्रति दिन भयावह होती जा रही है। इसके लिए हम कानूनी लड़ाई भी लड़ रहे हैं।