
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने पास्को एक्ट और अपहरण के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए फास्ट ट्रैक्ट विशेष कोर्ट पास्को द्वारा सजायाफ्ता आरोपित को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। गर्भवती छात्रा के गर्भपात के बाद भ्रूण का परीक्षण कराने पर आरोपित उसका जैविक पिता नहीं पाया गया। साथ ही नाबालिग ने भी आरोपित के साथ स्वेच्छा से जाने की रजामंदी देना फैसले का आधार बना।
24 मई 2022 को रायपुर के डीडी नगर थाना क्षेत्र से 17 वर्ष 3 माह की नाबालिग स्कूली छात्रा घर से निकली और वापस नहीं लौटी। पिता की शिकायत पर अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज हुआ। 31 मई 2022 को पीड़िता को छिंदवाड़ा से बरामद किया गया। जांच में पता चला कि आरोपित लक्ष्मीनारायण उर्फ लक्ष्मण उम्र 30 वर्ष, निवासी फलोदी, जोधपुर, राजस्थान उसे नागपुर, जोधपुर और छिंदवाड़ा ले गया था और उसके साथ दुष्कर्म किया।
मेडिकल परीक्षण में पीड़िता गर्भवती पाई गई, जिसके बाद एम्स रायपुर में उसका गर्भपात कराया गया। इस मामले में रायपुर पास्को कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर आरोपित को दोषी ठहराते हुए 20 साल के कठोर कारावास व जुर्माने की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ आरोपित ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
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डीएनए रिपोर्ट ने बदल दी मामले की दशा और दिशा
आरोपित के अधिवक्ता बी.पी. सिंह ने उच्च न्यायालय में तर्क दिया कि पीड़िता स्वयं अपनी मर्जी से आरोपी के साथ रायपुर रेलवे स्टेशन से नागपुर, जोधपुर और छिंदवाड़ा गई। पूरे सफर और होटलों, बसों में प्रवास के दौरान उसने किसी से कोई शिकायत या विरोध नहीं किया। गर्भपात के बाद जब्त किए गए भ्रूण की जब राज्य फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी में डीएनए जांच कराई गई, तो रिपोर्ट में आरोपित उस भ्रूण का जैविक पिता नहीं है। साथ ही अधिवक्ता ने बताया कि पीड़िता को बहला-फुसलाकर ले जाने का कोई सबूत नहीं है। इसलिए धारा 363 व 366 आईपीसी का अपराध नहीं बनता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णयों (एस. वरदराजन बनाम मद्रास राज्य, अलमेलु बनाम राज्य तथा हालिया निर्णय तिलकु उर्फ तिलक सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य - 2025) का हवाला देते हुए कहा कि 17 साल से अधिक उम्र की किशोरी सही और गलत की समझ रखती है। पीड़िता का बयान दर्शाता है कि उसने आरोपी के साथ लंबा सफर तय किया और लगातार उसकी संगति में बिना किसी प्रतिरोध या जबरदस्ती के रही। आरोपी द्वारा उसे बहला-फुसलाकर अभिभावकों की अभिरक्षा से दूर ले जाने का कोई सक्रिय तत्व साबित नहीं होता।
डीएनए रिपोर्ट ने अभियोजन की कहानी को खोखला किया
अदालत ने नोट किया कि डीएनए रिपोर्ट से स्पष्ट रूप से साबित हो चुका है कि पीड़िता के गर्भ में पल रहे भ्रूण का जैविक पिता आरोपी नहीं था। इससे अभियोजन पक्ष के दावों पर गंभीर संदेह उत्पन्न होता है, जिसका लाभ आरोपी को मिलना चाहिए। साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ संदेह से परे अपराध साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने अपील स्वीकार करते हुए रायपुर की फास्ट ट्रैक पास्को कोर्ट द्वारा 27 सितंबर 2024 को पारित सजा के आदेश को निरस्त कर दिया और आरोपित लक्ष्मीनारायण को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित न हो, तो उसे तत्काल जेल से रिहा किया जाए