
नईदुनिया प्रतिनिध, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की जेलों में एक साल के भीतर 33 कैदियों की मौत के मामले में हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस गंभीर स्थिति पर नाराजगी जताते हुए जेल महानिदेशक (डीजी जेल) से शपथ पत्र के साथ विस्तृत जानकारी मांगी है।
बताया गया है कि इनमें से अधिकांश मौतें बीमारी या हृदय और गुर्दा खराब होने के कारण हुई हैं, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि 22 मामलों में अब तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट लंबित है। हाई कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 15 अप्रैल की तिथि तय की है।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने विभिन्न जेलों में कैदियों की बढ़ती मृत्यु दर को गंभीरता से लेते हुए इसे जनहित याचिका के रूप में स्वतः संज्ञान में लिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने महानिदेशक (कारागार) को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, बिलासपुर केंद्रीय जेल में सबसे अधिक 10 मौतें दर्ज की गईं, जबकि दुर्ग केंद्रीय जेल में 8 और अंबिकापुर में 5 कैदियों की जान गई। इसके अलावा जगदलपुर, गरियाबंद, धमतरी और अन्य जिलों से भी मौत के मामले सामने आए हैं।
सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, बीमार पड़ने पर कई कैदियों को सिम्स बिलासपुर या मेकाहारा रायपुर में भर्ती कराया गया था, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। कोर्ट ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई है कि 33 में से 22 मामलों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट अब तक जेल विभाग को प्राप्त नहीं हुई है।
खासकर दुर्ग जेल के एक पुराने मामले में भी रिपोर्ट का न मिलना सिस्टम की सुस्ती को दर्शाता है। डिवीजन बेंच ने इस देरी को न्याय प्रक्रिया में बाधा माना है।
इस मामले में अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी हस्तक्षेप किया है। आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव और महानिदेशक (जेल) से पिछले दो वर्षों में हुई मौतों और जेलों में उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं पर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
हालांकि, राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण दास ने समाचार रिपोर्टों को पूरी तरह सही न बताते हुए अपना पक्ष रखा है। अब 15 अप्रैल को होने वाली सुनवाई में राज्य सरकार को जेलों की वास्तविक स्थिति का ब्योरा पेश करना होगा।