
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि जो पिता बिना तलाक लिए दूसरी महिला (दूसरी पत्नी) के साथ रह रहा है, उसे अपने बच्चे की कस्टडी देने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने साफ कहा कि बच्चे का हित सबसे ऊपर है और केवल पिता की आर्थिक क्षमता के आधार पर कस्टडी नहीं दी जा सकती।
यह मामला बच्चे की कस्टडी से जुड़ा था। सात साल का बच्चा अपनी मां के साथ रह रहा है। फैमिली कोर्ट ने पहले ही पिता को कस्टडी देने से इन्कार कर दिया था। पिता ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि बच्चा जन्म से ही अपनी मां के साथ रह रहा है और उसे वहां पूरा प्यार, देखभाल और सुरक्षित माहौल मिल रहा है। ऐसे में उसकी कस्टडी बदलना बच्चे के हित में नहीं होगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यह तय नहीं है कि सौतेली मां के साथ बच्चे को वही प्यार और अपनापन मिलेगा या नहीं। पिता ने दलील दी थी कि वह आर्थिक रूप से सक्षम है और बच्चे की जरूरतें बेहतर तरीके से पूरी कर सकता है। इस पर कोर्ट ने कहा कि केवल पैसों के आधार पर बच्चे की कस्टडी तय नहीं की जा सकती।
बच्चे का शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास सबसे ज्यादा जरूरी है। कोर्ट ने हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 का हवाला देते हुए कहा कि भले ही पिता को प्राकृतिक अभिभावक माना गया हो, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। हर मामले में बच्चे का कल्याण सर्वोच्च होता है।

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