• Jagran.com
  • Jagran Josh
  • Her Zindagi
  • Onlymyhealth
  • Jagran TV
  • Vishvas News
  • Inextlive
मेरी खबरें
  • होम
  • ताजा खबरें
  • मध्यप्रदेश
  • छत्तीसगढ़
  • उत्तर प्रदेश
  • देश
  • धर्म
  • मनोरंजन
  • राशिफल
  • लाइफस्टाइल
  • अन्य
    • बिज़नेस
    • बड़ी खबरें
    • खेल
    • विदेश
    • करियर
    • टॉपिक्स
    • टेक्नोलॉजी
    • शिक्षा
  • राज्य चुनें
  • ई-पेपर
  • राशिफल
  • राज्य चुनें
  • ई-पेपर
  • फटाफट
  • राशिफल
  • वेब स्टोरीज
नईदुनिया ट्रेंडिंग
  • बढ़ता यूपी
  • समृद्ध उत्तराखंड
  • Mutual Funds मास्टरी
  • होम
  • छत्तीसगढ़
  • बिलासपुर

सेलेक्शन लिस्ट में नाम होने के बावजूद नहीं दी नियुक्ति... 2015 का आदेश रद, हाई कोर्ट ने कहा- नए सिरे से लें फैसला

बिलासपुर हाई कोर्ट ने बहुउद्देश्यीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता (एमपीएचडब्ल्यू) के पद पर चयन सूची में नाम आने के बावजूद नियुक्ति नहीं दिए जाने के मामले में स...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Mohan Kumar
Publish Date: Sat, 08 Aug 2026 10:01:12 AM (IST)Updated Date: Sat, 08 Aug 2026 10:05:46 AM (IST)
सेलेक्शन लिस्ट में नाम होने के बावजूद नहीं दी नियुक्ति... 2015 का आदेश रद, हाई कोर्ट ने कहा- नए सिरे से लें फैसला
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट (फाइल फोटो)

HighLights

  1. MPHW चयन सूची विवाद में हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
  2. संयुक्त संचालक का 2015 का आदेश हाई कोर्ट से रद
  3. कोर्ट ने कहा कि बिना कारण बताए खारिज नहीं कर सकते अभ्यावेदन

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। हाई कोर्ट ने बहुउद्देश्यीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता (एमपीएचडब्ल्यू) के पद पर चयन सूची में नाम आने के बावजूद नियुक्ति नहीं दिए जाने के मामले में स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त संचालक द्वारा वर्ष 2015 में पारित आदेश को रद कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी अभ्यावेदन को खारिज करते समय सक्षम अधिकारी को कारण स्पष्ट रूप से दर्ज करना आवश्यक है। मनीष राजपूत, रविशंकर देवांगन और दिनेश सिंह राजपूत सहित चार याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2012 में जारी विज्ञापन के आधार पर एमपीएचडब्ल्यू पद के लिए आवेदन किया था।

चयन सूची में नाम आने के बावजूद उन्हें नियुक्ति आदेश जारी नहीं किया गया। याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जिसे पहले खारिज कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने रिट अपील दायर की, जिसमें डिवीजन बेंच ने 30 अक्टूबर 2014 को याचिकाकर्ताओं को राज्य सरकार के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी थी।


राज्य सरकार ने दिया यह तर्क

राज्य सरकार के निर्देश पर याचिकाकर्ताओं ने अभ्यावेदन प्रस्तुत किया, लेकिन 16 सितंबर 2015 को स्वास्थ्य सेवा के संयुक्त संचालक ने इसे खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस आदेश में कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया। राज्य ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि 14 वर्ष बीत जाने के बाद अब याचिकाकर्ताओं के दावे पर पुनर्विचार करना उचित नहीं होगा।

यह भी पढ़ें- पति की सैलरी 71 हजार, फिर भी पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता, बिलासपुर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

पहले सुनवाई का दें अवसर

जस्टिस राकेश मोहन पांडेय ने 2015 के आदेश को रद करते हुए मामले को संयुक्त संचालक, स्वास्थ्य सेवाएं को वापस भेज दिया है। अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि याचिकाकर्ताओं को उचित सुनवाई का अवसर देने के बाद उनके अभ्यावेदन पर नए सिरे से निर्णय लें।