बिलासपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

छत्तीसगढ़ की प्रमुख नदियों में से एक जिले की जीवन दायिनी अंतः सलिला अरपा नदी को बचाने दस साल तक आंदोलन चला। उद्गम स्थल को संरक्षित करने,बढ़ते प्रदूषण व अवैध उत्खनन को रोकना बड़ी चुनौती थी। शहर के बुद्धिजीवियों ने एक मंच पर आकर आंदोलन शुरू किया। वर्ष 2011 में अरपा विकास प्राधिकरण का गठन हुआ,यह एक बड़ी जीत थी।

अरपा नदी का उद्गम पेंड्रा के पास अमरपुर गांव के एक खेत से हुआ है। यहां से धारा बहती हुई थोड़ी दूर जाकर छतौना गांव में एक बड़े नाले के रूप में परिवर्तित होती है। खोडरी खोंखसरा पहुंचने पर दो अन्य नाले इसमें मिलते हैं यहीं से यह विराट रूप लेकर नदी बनती है। शहर से होकर गुजरने वाली यह नदी लाखों पशु,पक्षियों और मनुष्य के गले को तर करती हुई खेतों में हरियाली पहुंचती है। तपती धूप और सूखे जैसे स्थिति में भी यह कभी नहीं सूखती। रेत में जरा सा हाथ डालने पर तुरंत पानी आ जाता था। इसलिए इसका नाम अंतः सलिला भी पड़ा। बिल्हा के पास बिटकुली से होकर यह शिवनाथ नदी में मिल जाती है। वर्ष 1990 के बाद नदी प्रदूषित होने लगी। वर्ष 1995 के आते आते अवैध उत्खनन तेज होने लगा। उद्गम स्थल पर दलदल होने लगा। 2001 को बुद्धिजीवियों ने इसे बचाने संकल्प लिया। 2009 में सतह से जब पानी गायब होने लगा तो अरपा बिलासा कला मंच के पदाधिकारियों ने एकजुट होकर अरपा बचाओ बचाओ अभियान शुरू किया। उद्यगम स्थल से तीन दिन की जनजागरण यात्रा प्रारंभ किया। लोगों को पौधे लगाने, उत्खनन नहीं करने और नदी में कचरा नहीं डालने जागरूक किया। रात दिन एक कर सदस्यों ने गांव से लेकर शहर के सभी लोगों को समझाया। बीस लोगों की इस यात्रा का परिणाम भी आया। शासन ने वर्ष 2011 में अरपा विकास प्राधिकरण का गठन कर नदी बचाने कदम उठाया। जिला प्रशासन,कमिश्नर को निगम के अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी।

युवाओं-बुजुर्गों ने उठाया बीड़ा

अरपा को बचाने बच्चों से लेकर बुजुर्गों ने कदम से कदम मिलाया। युवाओं ने भी इसमें बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। 1992 में अरपा बचाओ अभियान की गाथा लिखनी शुरू हुई। बिलासा कला मंच के संस्थापक और राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ यादव उद्गम स्थल को देखकर जब घर पहुंचे तो काफी निराशा हुए। दलदली जमीन और प्रदूषित होती नदी को बचाने संकल्प लिया। इसके बाद से लगातार से लोगों को जनजागरण के लिए जोड़ते गए। अभियान में राजेंद्र मौम, डॉ.सुधाकर दुबे, महेश श्रीवास,उदय शर्मा और अश्वनी पाण्डेय सहित बीस लोगों की टीम ने आंदोलन खड़ा किया।

देशभर से पहुंचते थे लोग

अरपा नदी का पानी पीने और इसे देखने देशभर से लोग आते थे। इसकी दो प्रमुख वजह बताया जाता है पहला यह कि नदी का पानी पीने में मीठा और अतिप्रिय लगता था। कंठ को राहत देने वाला था। गर्मी के दिनों में जब कई प्रदेशों की नदियां सूख जाया करती थी अरपा अपनी भीतरी प्रवाह से शांत बहती रहती थी। जंगली जानवरों के अलावा पशु पक्षियों की कोलाहल हमेशा सुनाई पड़ती थी। इसी वजह से इसे बचाने देशभर से लोगों आगे आने लगे।

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