
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। जल संसाधन विभाग में नियमित होने से पहले काम करने की अवधि की ग्रेच्युटी मिलेगी या नहीं, इसका फैसला अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर निर्भर करेगा। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस मुद्दे से जुड़ी राज्य शासन की 15 याचिकाओं का निराकरण करते हुए कहा है कि यदि सुप्रीम कोर्ट का फैसला श्रमिकों के पक्ष में आता है तो उन्हें श्रम प्राधिकारी द्वारा निर्धारित ग्रेच्युटी की राशि का लाभ देना होगा।
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने यह आदेश दिया है।मामले में राज्य शासन और दुर्ग स्थित जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता ने श्रम आयुक्त कार्यालय के उप श्रम आयुक्त द्वारा 20 जनवरी 2017 को पारित आदेश को चुनौती दी थी। उप श्रम आयुक्त ने राज्य शासन की अपील को समय-सीमा के आधार पर खारिज कर दिया था।
इसके चलते नियंत्रक प्राधिकारी द्वारा 31 दिसंबर 2014 को श्रमिकों के पक्ष में दिया गया आदेश अंतिम हो गया था। नियंत्रक प्राधिकारी ने श्रमिकों की सेवा की गणना उनकी प्रारंभिक नियुक्ति के बजाय शुरुआती काम पर लगाए जाने की तारीख से करने का निर्देश दिया था।
इसके अनुसार नियमितीकरण से पहले की सेवा अवधि, यानी 1 अगस्त 1979 से 26 जनवरी 1988 तक की अवधि की ग्रेच्युटी देने का आदेश दिया गया था। इन याचिकाओं में जगदीश राम निर्मलकर, बाबूराम कमल, कीर्तन राम ठाकुर, युगल किशोर साहू, चंपा बाई सहित 15 श्रमिक पक्षकार थे।
राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता विनय पांडेय ने बताया कि नियमितीकरण से पहले की सेवा अवधि को ग्रेच्युटी की गणना में शामिल करने का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में धनसाई साहू बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले में विचाराधीन है। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित आदेशों पर रोक लगाते हुए मामले को बड़ी पीठ के विचार के लिए भेजा है। शासन ने इसी आधार पर इन याचिकाओं को फिलहाल लंबित रखने की मांग की थी। वहीं श्रमिकों के अधिवक्ता राजकुमार पाली ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित होने से हाई कोर्ट इन याचिकाओं का गुण-दोष के आधार पर निराकरण करने से नहीं रुकता।