अपराधियों को सजा दिलाने बिलासपुर आईजी की नई मुहिम, 200 पुलिसकर्मियों को मिला 'डाइंग डिक्लेरेशन' का कड़ा प्रशिक्षण
बिलासपुर रेंज के आईजी राम गोपाल गर्ग के मार्गदर्शन में पुलिस विवेचना को त्रुटिहीन बनाने और अदालतों में सजा का प्रतिशत बढ़ाने के उद्देश्य से 'मरणासन्न ...और पढ़ें
Publish Date: Thu, 28 May 2026 02:19:08 PM (IST)Updated Date: Thu, 28 May 2026 02:19:08 PM (IST)
कार्यशाला को संबोधित करते आइजी रामगोपल गर्गHighLights
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 26 पर मंथन
- लापरवाही पर हाई कोर्ट बदल सकता है फैसला
- विवेचना में छोटी चूक भी पहुंचाएगी आरोपियों को फायदा
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। राम गोपाल गर्ग के मार्गदर्शन में बुधवार को मरणासन्न कथन (डाइंग डिक्लेरेशन) विषय पर रेंज स्तरीय एक दिवसीय आनलाइन कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला का उद्देश्य गंभीर अपराधों की विवेचना को त्रुटिहीन बनाना और न्यायालयों में सजा का प्रतिशत बढ़ाना था। कार्यक्रम में रेंज के विभिन्न जिलों से करीब 200 पुलिस अधिकारी एवं कर्मचारी शामिल हुए।
कार्यशाला को संबोधित करते हुए आइजी रामगोपाल गर्ग ने कहा कि मृत्यु पूर्व कथन, डीएनए और भौतिक साक्ष्यों का सही संकलन अपराधियों को सजा दिलाने में अहम भूमिका निभाते हैं। विवेचना में छोटी गलतियां भी आरोपितों को लाभ पहुंचा सकती हैं। कार्यशाला में भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) 2023 की धारा 26 के तहत डाइंग डिक्लेरेशन की कानूनी वैधता और उसके महत्व पर विस्तार से चर्चा हुई।
प्रशिक्षण के दौरान अधिकारियों को बताया गया कि बयान दर्ज करने से पहले और बाद में डाक्टर से पीड़ित के मानसिक रूप से स्वस्थ होने का प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य है। इसके अलावा एफएसएल रिपोर्ट, रक्त समूह मिलान, एससी-एसटी एक्ट मामलों में स्पष्ट उल्लेख और गवाहों की कानूनी तैयारी जैसे विषयों पर भी दिशा-निर्देश दिए गए। अंत में प्रश्नोत्तर सत्र में विवेचना से जुड़ी व्यावहारिक समस्याओं का समाधान किया गया।
डाइंग डिक्लेरेशन मजबूत साक्ष्य
कार्यशाला में शासकीय अधिवक्ता रजनीकांत ठाकुर ने बताया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) 2023 की धारा 26 के तहत मरणासन्न कथन न्यायालय में अत्यंत महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जाता है। यदि बयान मजिस्ट्रेट द्वारा प्रश्नोत्तर शैली में दर्ज किया गया हो तो उसकी प्रमाणिकता और अधिक मजबूत हो जाती है।
उन्होंने कहा कि कई मामलों में मृतक का अंतिम बयान ही आरोपित को सजा दिलाने का आधार बनता है। इसलिए विवेचकों को प्रक्रिया का पूरी गंभीरता से पालन करना चाहिए।
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डाक्टर के फिटनेस प्रमाणपत्र पर विशेष जोर
कार्यशाला में अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि डाइंग डिक्लेरेशन दर्ज करने से पहले और बाद में डाक्टर से पीड़ित के फिट स्टेट आफ माइंड का प्रमाणपत्र अवश्य लिया जाए। प्रशिक्षण में ऐसे न्यायिक मामलों का भी उल्लेख किया गया, जहां प्रमाणपत्र की कमी के कारण उच्च न्यायालय ने सजा पलट दी। अधिकारियों को बताया गया कि चिकित्सकीय प्रमाणन के अभाव में बचाव पक्ष अदालत में कथन की वैधता को चुनौती दे सकता है। इसलिए इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं बरतने की सलाह दी गई।
एफएसएल रिपोर्ट और गवाह तैयारी पर निर्देश
प्रशिक्षण के दौरान विवेचकों को चालान पेश करते समय कापी-पेस्ट से बचने और हर मामले के तथ्यों का स्वतंत्र परीक्षण करने की सलाह दी गई। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि एफएसएल रिपोर्ट में रक्त समूह का मिलान अनिवार्य रूप से कराया जाए। वहीं एससी-एसटी एक्ट से जुड़े मामलों में प्रारंभिक जांच के दौरान जातिसूचक शब्दों का स्पष्ट उल्लेख करने को कहा गया। गवाहों को अदालत में पेश होने से पहले कानूनी प्रक्रिया की जानकारी देने और साक्ष्य प्रस्तुत करने की तैयारी कराने पर भी जोर दिया गया।