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स्कूल रजिस्टर से उम्र साबित नहीं होती, अपनी मर्जी से गई लड़की अपहरण नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा, जन्मतिथि का पक्का प्रमाण नहीं तो लड़की को नाबालिग नहीं माना जा सकता।

By Kamlesh RajakEdited By: Akash Sharma
Publish Date: Mon, 05 Oct 2026 11:05:28 AM (IST)Updated Date: Mon, 05 Oct 2026 11:05:28 AM (IST)
स्कूल रजिस्टर से उम्र साबित नहीं होती, अपनी मर्जी से गई लड़की अपहरण नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
बिलासपुर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

HighLights

  1. धारा 363 और 366 की सजा रद्द हुई
  2. स्कूल रजिस्टर से उम्र साबित नहीं हुई
  3. अपनी इच्छा से जाना अपहरण नहीं है

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर अभियोजन पक्ष लड़की की उम्र का ठोस और कानूनी प्रमाण पेश करने में नाकाम रहता है तो उसे नाबालिग नहीं माना जा सकता। ऐसी स्थिति में लड़की का अपनी इच्छा से किसी के साथ जाना अपहरण की श्रेणी में नहीं आएगा। इस टिप्पणी के साथ जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की सिंगल बेंच ने जांजगीर-चांपा जिले के राजेंद्र श्रीवास उर्फ मोटू को बरी कर दिया है।

क्या था पूरा मामला

यह मामला मुलमुला थाना क्षेत्र का है। 30 मई 2019 को एक लड़की अपने घर से चली गई थी। उसके बहनोई ने थाने में इसकी शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने गुमशुदगी का केस दर्ज किया। जांच के दौरान उसी दिन पुलिस ने लड़की को जयरामनगर रेलवे स्टेशन पर राजेंद्र श्रीवास के साथ बरामद कर लिया था। मामले की सुनवाई के बाद विशेष न्यायालय ने 15 अक्टूबर 2019 को राजेंद्र को दोषी मानते हुए आईपीसी की धारा 363 में चार साल और धारा 366 में पांच साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ राजेंद्र ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।


स्कूल रिकॉर्ड से उम्र साबित नहीं हुई

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि अभियोजन ने लड़की की जन्मतिथि साबित करने के लिए सिर्फ स्कूल के दाखिल-खारिज रजिस्टर का सहारा लिया था। स्कूल के प्रधानाध्यापक ने अपनी गवाही में माना कि रजिस्टर में जन्मतिथि लड़की के पिता द्वारा बताई गई जानकारी के आधार पर लिखी गई थी। इसके समर्थन में कोई जन्म प्रमाण पत्र या अन्य सरकारी दस्तावेज पेश नहीं किया गया। साथ ही लड़की का अस्थि परीक्षण यानी ओसिफिकेशन टेस्ट भी नहीं कराया गया था।

कोर्ट ने कहा कि इस तरह के सबूत नाबालिग होने का पुख्ता प्रमाण नहीं है। कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के अलमेलु बनाम राज्य और ऋषिपाल सिंह सोलंकी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामलों का जिक्र किया, जिसमें कहा गया है कि केवल स्कूल रिकॉर्ड के आधार पर उम्र तय नहीं की जा सकती।

अपनी मर्जी से गई थी लड़की

इस केस में लड़की के बयान को भी कोर्ट ने अहम माना। लड़की ने खुद बताया था कि राजेंद्र उसका स्कूल का दोस्त था और दोनों के बीच मोबाइल फोन पर बात होती थी। घटना वाले दिन 30 मई 2019 को सुबह करीब चार बजे राजेंद्र के बुलाने पर वह खुद बिना किसी शोर-शराबे और बिना किसी विरोध के अपनी मर्जी से उसके साथ बाइक पर बैठकर चली गई थी।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एस. वरदराजन बनाम स्टेट ऑफ मद्रास केस का हवाला देते हुए कहा कि किसी लड़की का खुद किसी के साथ चले जाना और उसे जबरदस्ती ले जाना दो अलग-अलग बातें हैं। इस मामले में अपहरण या बहला-फुसलाने जैसा कोई तत्व नहीं मिला।

इन सभी तथ्यों के आधार पर हाई कोर्ट ने अभियोजन पक्ष को आरोप साबित करने में विफल माना और संदेह का लाभ देते हुए राजेंद्र श्रीवास को धारा 363 और 366 के आरोपों से बरी कर दिया। निचली अदालत द्वारा दी गई सजा के आदेश को निरस्त कर दिया गया है।