
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के समय जो अनुकंपा नियुक्ति नीति प्रभावी थी, उसी के आधार पर आश्रित के दावे का फैसला किया जाएगा। बाद में लागू की गई संशोधित नीति या संकलित सर्कुलर का उपयोग पहले से प्राप्त अधिकार को समाप्त करने के लिए नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने हेड कांस्टेबल स्वर्गीय देवजी मंडावी की दूसरी पत्नी रुखमणी मंडावी और उनके पुत्र उमेश मंडावी की याचिका स्वीकार करते हुए 31 जुलाई 2021 के आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही शासन को 90 दिनों के भीतर वर्ष 2013 की नीति के अनुरूप नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया।
मामले के अनुसार, ग्राम झिपटोला चारामा कांकेर निवासी स्वर्गीय देवजी मंडावी छत्तीसगढ़ पुलिस में हेड कांस्टेबल के पद पर कार्यरत थे। 11 मई 2016 को सेवा के दौरान उनका निधन हो गया। उनके परिवार में पहली पत्नी, दूसरी पत्नी रुखमणी मंडावी और दोनों परिवारों के बच्चे आश्रित के रूप में थे। दूसरी पत्नी का पुत्र उमेश मंडावी उस समय नाबालिग था।
इसी कारण रुखमणी मंडावी ने जुलाई 2016 में विभाग को आवेदन देकर अनुरोध किया कि उनके पुत्र के बालिग होने तक अनुकंपा नियुक्ति का दावा सुरक्षित रखा जाए। उमेश मंडावी 26 मई 2018 को बालिग हुआ, जिसके बाद नियुक्ति के लिए दावा किया गया।
विभाग ने 31 जुलाई 2021 को आवेदन खारिज कर दिया। विभाग का तर्क था कि मृत कर्मचारी की पहली पत्नी से पुत्र हिमेश्वर मंडावी पहले से पुलिस विभाग में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत है। इसलिए परिवार के दूसरे सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति का लाभ नहीं दिया जा सकता। इस निर्णय को चुनौती देते हुए रुखमणी मंडावी और उमेश मंडावी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि कर्मचारी की मृत्यु 11 मई 2016 को हुई थी। उस समय 14 जून 2013 की अनुकंपा नियुक्ति नीति प्रभावी थी। इस नीति के क्लाज 15(8) में स्पष्ट प्रावधान था कि यदि आश्रित नाबालिग है तो उसके बालिग होने तक अनुकंपा नियुक्ति का दावा सुरक्षित रहेगा।
अदालत ने कहा कि उस समय नीति में ऐसी कोई शर्त नहीं थी कि यदि परिवार का कोई सदस्य सरकारी सेवा में हो तो दूसरे आश्रित को अनुकंपा नियुक्ति नहीं मिल सकती।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि परिवार के किसी सदस्य के सरकारी नौकरी में होने पर दूसरे आश्रित को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करने की शर्त 29 अगस्त 2016 के संशोधन के माध्यम से जोड़ी गई थी। चूंकि कर्मचारी की मृत्यु इससे पहले हो चुकी थी, इसलिए यह संशोधित प्रावधान उनके मामले पर लागू नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारी की मृत्यु के साथ ही अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार उत्पन्न हो जाता है। ऐसे में बाद में लागू किसी संशोधन या नई नीति के आधार पर उस अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा किया जाए तो वर्ष 2013 की नीति में नाबालिग आश्रितों को दी गई सुरक्षा का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
हाई कोर्ट ने 31 जुलाई 2021 के आदेश को निरस्त करते हुए राज्य शासन को निर्देश दिया कि उमेश मंडावी के अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर 14 जून 2013 की नीति के अनुसार नए सिरे से विचार किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया में 29 अगस्त 2016 के संशोधन और 23 फरवरी 2019 के संकलित सर्कुलर में जोड़ी गई अपात्रता की शर्तों को लागू नहीं किया जाएगा।
साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि पूरी प्रक्रिया 90 दिनों के भीतर पूरी की जाए। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति से संबंधित अन्य पात्रता शर्तों की जांच करने का अधिकार विभाग के पास रहेगा।