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छत्तीसगढ़ HC का बड़ा फैसला: DNA रिपोर्ट में पिता नहीं फिर भी बेटी को मिलेगा पिता का नाम, साबित करनी होगी नो-एक्सेस थ्योरी

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि वैध शादी के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता पर केवल डीएनए रिपोर्ट से सवाल नहीं उठ सकता।

By Kamlesh RajakEdited By: Akash Sharma
Publish Date: Mon, 05 Oct 2026 09:07:14 AM (IST)Updated Date: Mon, 05 Oct 2026 10:03:11 AM (IST)
छत्तीसगढ़ HC का बड़ा फैसला: DNA रिपोर्ट में पिता नहीं फिर भी बेटी को मिलेगा पिता का नाम, साबित करनी होगी नो-एक्सेस थ्योरी
CG हाईकोर्ट ने कहा- माता-पिता के विवाद का केंद्र नहीं बन सकते बच्चे (AI Generated Image)

HighLights

  1. हाईकोर्ट का बच्चे की पहचान पर बड़ा फैसला
  2. 2005 में शादी, 2006 में बेटी का जन्म
  3. बच्चे की इज्जत से समझौता नहीं होगा

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बच्चे की पहचान और उसके सम्मान को लेकर बेहद महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि शादी के दौरान जन्मे बच्चे के पिता होने पर सिर्फ डीएनए रिपोर्ट के आधार पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।

सिर्फ डीएनए रिपोर्ट काफी नहीं, नो-एक्सेस साबित करना होगा

जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की बेंच ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 116 के तहत शादी के दौरान जन्मे बच्चे को लेकर एक मजबूत कानूनी धारणा होती है। इस धारणा को खत्म करने के लिए पति को ठोस सबूत देना होगा कि जब बच्चा पेट में आया, उस वक्त पति-पत्नी के बीच मिलने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी।


अगर ऐसा पुख्ता सबूत नहीं है तो बच्चे की पहचान पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अपर्णा अजेंक्य फिरोदिया बनाम अजेंक्य अरुण फिरोदिया और इवान राथिनम बनाम मिलन जोसेफ केस का हवाला भी दिया।

क्या है पूरा मामला?

मामला दुर्ग जिले का है। एक शख्स की शादी 5 मई 2005 को हुई थी। 21 सितंबर 2006 को उसकी बेटी का जन्म हुआ। बाद में दोनों पति-पत्नी का 15 नवंबर 2016 को आपसी रजामंदी से तलाक हो गया। गुजारा भत्ता के केस के दौरान डीएनए टेस्ट कराया गया, जिसमें शख्स बच्ची का बायोलॉजिकल पिता नहीं निकला।

इसके बाद उसने फैमिली कोर्ट में केस लगाकर बेटी के स्कूल और सरकारी कागजों से अपना नाम हटाने की मांग की। दुर्ग फैमिली कोर्ट ने 5 अप्रैल 2025 को उसकी मांग को खारिज कर दिया था। इसी आदेश के खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील की थी।

बच्चे की इज्जत सबसे ऊपर

हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि बच्चों को छोटी-छोटी बातों पर कोर्ट में उनकी पहचान पर सवाल उठाकर परेशान नहीं किया जाना चाहिए। बच्चों को मां-बाप के झगड़े का हथियार नहीं बनाना चाहिए। बच्चे की फैमिली हिस्ट्री उसकी पहचान और उसकी इज्जत से जुड़ी है, जिसे सिर्फ एक डीएनए रिपोर्ट के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।