
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। अविवाहित बड़े भाई की मृत्यु के बाद भारतीय स्टेट बैंक के खाते में जमा लाखों रुपये की राशि के लिए छोटे भाई को उत्तराधिकारी प्रमाण-पत्र हासिल करने का रास्ता साफ हो गया है। बिलासपुर के प्रथम व्यवहार न्यायाधीश एवं वरिष्ठ श्रेणी के तृतीय अतिरिक्त न्यायाधीश संजू लता देवांगन ने मामले की सुनवाई करते हुए आवेदक मिलिंद डी. भिड़े को उसके दिवंगत बड़े भाई विलास दिगंबर भिंडे के नाम संचालित बैंक खाते की राशि के संबंध में उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र जारी करने का आदेश दिया है।
बैंक ने अदालत को बताया कि खाते में वर्तमान में 47,83,908.62 रुपये जमा हैं। उत्तराधिकार मामले में आवेदक मिलिंद डी. भिड़े, पिता दिगंबर वामन भिड़े, उम्र 64 वर्ष, निवासी व्याडेश्वर निवास, महाराणा प्रताप नगर, मॉडल स्कूल के पास, वार्ड नंबर 52, बोरसी, जिला दुर्ग ने अदालत में आवेदन प्रस्तुत किया था।
आवेदन में बताया गया कि विलास दिगंबर भिंडे उनके सगे बड़े भाई थे। उनकी मृत्यु 31 मई 2024 को बिलासपुर के हेमूनगर में हुई थी। वह जीवनभर अविवाहित रहे। उनके माता-पिता दिगंबर वामन भिंडे की मृत्यु 11 अप्रैल 1961 और माता पुष्पजा भिंडे की मृत्यु 2 जून 1993 को हो चुकी थी। इस कारण मृतक के पीछे आवेदक के अलावा कोई अन्य कानूनी वारिस नहीं होने का दावा किया गया।
मृतक विलास भिंडे का भारतीय स्टेट बैंक, तितली चौक, रेलवे कॉलोनी, बिलासपुर शाखा में बचत खाता क्रमांक 10280150041 था। आवेदन के समय खाते में 45,17,036 रुपये जमा होने की जानकारी दी गई थी। खाते में कोई नॉमिनी नियुक्त नहीं था। आवेदक ने मृतक का मृत्यु प्रमाण-पत्र, बैंक पासबुक, आधार कार्ड, पैन कार्ड और अन्य दस्तावेज अदालत में पेश किए। अपनी पहचान के लिए भी आधार और पैन कार्ड प्रस्तुत किए गए।
सुनवाई के दौरान बैंक की ओर से शाखा प्रबंधक आशीष कुमार गौतम ने शपथपत्र और दस्तावेज पेश कर बताया कि उक्त खाता मृतक विलास दिगंबर भिंडे के नाम पर है और उसमें वर्तमान में 47,83,908.62 रुपये जमा हैं। बैंक ने यह भी स्पष्ट किया कि उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र प्रस्तुत किए जाने पर वह उक्त राशि का भुगतान करने के लिए तैयार है।
प्रकरण में आम जनता को सूचना देने के लिए समाचार पत्र में प्रकाशन कराया गया था। इसके बावजूद किसी अन्य व्यक्ति ने उपस्थित होकर राशि पर अपना दावा या आपत्ति पेश नहीं की। आम जनता को अनावेदक क्रमांक दो के रूप में रखा गया था और वह पहले से एकपक्षीय था।
अदालत ने दस्तावेजों और आवेदक के बयान का परीक्षण करने के बाद माना कि मृतक अविवाहित था, उसके माता-पिता का पहले ही निधन हो चुका था और आवेदक के अलावा कोई अन्य उत्तराधिकारी सामने नहीं आया। अदालत ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8 के तहत आवेदक को अनुसूची-एक के वर्ग-एक के वारिस के रूप में प्रथम दृष्टया उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र प्राप्त करने का अधिकारी माना।
अदालत ने आवेदन स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि नियमानुसार न्यायालय शुल्क अदा किए जाने के बाद मृतक के नाम संचालित एसबीआई के बचत खाते में जमा राशि 45,17,036 रुपये, जो बैंक के अनुसार वर्तमान में 47,83,908.62 रुपये है, ब्याज सहित (यदि कोई हो) प्राप्त करने के लिए आवेदक के पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र जारी किया जाए।