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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 19, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

40 साल चला 100 रुपये की रिश्वत का मामला, Chhattisgarh HC ने पलट दिया फैसला

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 100 रुपये रिश्वत लेने के मामले में 40 साल बाद आरोपी को दोषमुक्त कर दिया है। हाई कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दिए गए 1 साल के कार...और पढ़ें

By Roman TiwariEdited By: Roman Tiwari
Publish Date: Fri, 19 Sep 2025 04:30:22 PM (IST)Updated Date: Fri, 19 Sep 2025 04:34:33 PM (IST)
40 साल चला 100 रुपये की रिश्वत का मामला, Chhattisgarh HC ने पलट दिया फैसला
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 40 साल पुराने मामले में फैसला दिया

HighLights

  1. बिल भुगतान के लिए 100 रुपये रिश्वत मांगने का था आरोप
  2. निचली अदालत के एक वर्ष सजा व अर्थदंड को किया निरस्त
  3. आरोप था कि अवधिया ने बिल के लिए 100 रुपये की रिश्वत मांगी

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: साल 1986 में लंबित बिल भुगतान के लिए 100 रुपये रिश्वत लेने के आरोपित एमपीएसआरटीसी रायपुर के वित्त विभाग के बिल सहायक को हाई कोर्ट ने दोषमुक्त कर दिया है। निचली अदालत द्वारा सुनाई गई एक वर्ष की सजा और अर्थदंड को न्यायालय ने निरस्त कर दिया है।

यह है मामला

शिकायतकर्ता अशोक कुमार वर्मा ने वर्ष 1981 से 1985 के दौरान सेवाकालीन बकाया बिल भुगतान के लिए वित्त विभाग के बिल सहायक रामेश्वर प्रसाद अवधिया से संपर्क किया था। आरोप था कि अवधिया ने बिल पारित करने के लिए 100 रुपये की रिश्वत मांगी। इस पर शिकायत लोकायुक्त के पास दर्ज कराई गई।


लोकायुक्त की टीम ने ट्रैप कार्रवाई की योजना बनाई और शिकायतकर्ता को 50-50 रुपये के रासायनिक लगे नोट देकर भेजा। कार्रवाई के दौरान टीम ने अवधिया को रंगे हाथों पकड़कर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया और न्यायालय में चालान पेश किया।

निचली अदालत ने यह दिया फैसला

दिसंबर 2004 में निचली अदालत ने अवधिया को दोषी मानते हुए एक वर्ष की कैद और 1000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी।

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हाई कोर्ट ने यह सुनाया फैसला

अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस बी.डी. गुरु की बेंच ने कहा कि, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 के तहत दर्ज मामला, अधिनियम 1988 लागू होने के बाद भी विचारणीय है। लेकिन अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि अपीलकर्ता ने वास्तव में अवैध परितोषण की मांग और स्वीकृति दी थी। उपलब्ध मौखिक, दस्तावेजी या परिस्थितिजन्य साक्ष्य से रिश्वतखोरी का अपराध सिद्ध नहीं होता।

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कोर्ट ने पाया कि अभियोजन अपने साक्ष्य भार को सिद्ध करने में असफल रहा, इसलिए निचली अदालत का दोषसिद्धि आदेश अस्थिर है। इस आधार पर हाई कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि और सजा दोनों को रद्द कर दिया।