
नईदुनिया ब्यूरो, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने जमीन के स्वामित्व और कब्जे से जुड़े विवाद में ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी है। जस्टिस सुषमा सावंत की एकल पीठ ने कहा कि केवल पुराने पंजीकृत विक्रय पत्र के आधार पर जमीन पर अधिकार का दावा पर्याप्त नहीं है। दावेदार को यह भी साबित करना होगा कि जमीन पर उसके पूर्वज ने वास्तव में अधिकार का इस्तेमाल किया था और वह स्वयं उसका वैध उत्तराधिकारी है।
मामले में याचिकाकर्ता न तो जमीन पर अपना कब्जा साबित कर सका और न ही ऐसे दस्तावेज पेश कर पाया, जिनसे उसकी मां का कृपाराम की बेटी होना प्रमाणित हो। उसने अपनी बहन आंगनमति को भी मुकदमे में पक्षकार नहीं बनाया था।
मामला जांजगीर-चांपा जिले की चांपा तहसील के ग्राम तलदेवरी स्थित खसरा नंबर 3143 की 0.11 एकड़ जमीन का है। ग्राम बिर्रा निवासी राखीराम ने दावा किया था कि उसके नाना कृपाराम ने 5 अगस्त 1975 को घासीराम से पंजीकृत विक्रय पत्र के जरिए जमीन खरीदी थी और कब्जा भी प्राप्त कर लिया था। कृपाराम की मृत्यु के बाद राखीराम और उसकी बहन आंगनमति के नाम नाना की अन्य जमीनों के राजस्व अभिलेखों में दर्ज हुए थे।
राखीराम का कहना था कि उसे लगा कि विवादित जमीन भी उनके नाम दर्ज है। दिसंबर 2011 में जब घासीराम के बेटों दराश्रम और चंद्रम ने खेती करने से रोका और बाद में जमीन लता शराफ को बेच दी, तब उसने स्वामित्व, कब्जे और स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया। राखीराम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एचबी अग्रवाल ने तर्क दिया कि 1975 का पंजीकृत विक्रय पत्र मौजूद है और घासीराम या उसके बेटों ने तीन साल के भीतर उसे चुनौती नहीं दी।
ऐसे में ट्रायल कोर्ट उस दस्तावेज को दिखावटी मानकर उसके आधार पर पूरे दावे को खारिज नहीं कर सकती थी। उनका कहना था कि कृपाराम के नाम राजस्व अभिलेखों में नामांतरण नहीं होना पटवारी की चूक हो सकती है, इससे पंजीकृत विक्रय पत्र का महत्व समाप्त नहीं होता। जब कृपाराम जमीन खरीद चुके थे, तो उनके बेटों को जमीन दोबारा बेचने का अधिकार नहीं था और लता शराफ के पक्ष में किया गया बाद का विक्रय भी वैध अधिकार नहीं दे सकता।
प्रतिवादियों की ओर से तर्क दिया गया कि राखीराम की गवाही से ही स्पष्ट है कि उसे जमीन के खसरा नंबर, रकबे और वास्तविक कब्जे की जानकारी नहीं थी। उसने यह भी नहीं बताया कि कृपाराम की जमीन उसके पास किस आधार पर आई। लता शराफ ने दावा किया था कि उसने 16 नवंबर 2011 को दराश्रम और चंद्रम से पंजीकृत विक्रय पत्र के जरिए जमीन खरीदी और उस पर कब्जा प्राप्त किया। उसने राखीराम के कृपाराम की बेटी कचरबाई का बेटा होने पर भी सवाल उठाया था।
हाई कोर्ट ने माना कि सामान्य तौर पर राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज न होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि किसी व्यक्ति ने संपत्ति पर अपना अधिकार छोड़ दिया। लेकिन इस मामले में 1975 से लेकर मुकदमा दायर होने से पहले तक करीब 25 से 30 साल तक कृपाराम का नाम दर्ज नहीं हुआ।
कृषि भूमि पर लगातार कब्जे का दावा होने के बावजूद खेती और कब्जे से संबंधित अभिलेखों में उसका नाम नहीं था। खरीदी-बिक्री करने वाले घासीराम और खरीदार कृपाराम, दोनों की मृत्यु हो चुकी थी और दस्तावेज के वास्तविक लेन-देन के रूप में अमल में आने का कोई स्वतंत्र प्रमाण भी नहीं था। इन परिस्थितियों में कोर्ट ने संदेह जताया कि विक्रय पत्र के आधार पर वास्तव में जमीन का हस्तांतरण हुआ था या वह केवल दस्तावेज तक सीमित रहा।
पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि राखीराम अपनी जिरह में जमीन का खसरा नंबर, रकबा और कब्जेदार नहीं बता सका तथा उसने स्वीकार किया कि लता शराफ जमीन पर काबिज थी। कृपाराम की जमीन के राजस्व अभिलेखों में उसकी बहन आंगनमति का नाम दर्ज था, लेकिन राखीराम ने न तो उसे पक्षकार बनाया और न ही गवाह के रूप में पेश किया। वह अपनी मां कचरबाई का कृपाराम की बेटी होना साबित करने के लिए कोटवार रजिस्टर या अन्य संबंधित दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं कर सका।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही यह मान लिया जाए कि कृपाराम ने जमीन खरीदी और कब्जा लिया था, तब भी राखीराम को उत्तराधिकारी के रूप में अपना अधिकार साबित करना जरूरी था। दूसरे संभावित उत्तराधिकारियों के अधिकारों पर विचार किए बिना उसके पक्ष में स्वामित्व की घोषणा नहीं की जा सकती थी।
प्रतिवादियों की ओर से स्वतंत्र साक्ष्य पेश नहीं किए जाने से भी राखीराम के ऊपर अपना दावा साबित करने की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। हाई कोर्ट ने प्रथम अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, जांजगीर के 23 दिसंबर 2016 के फैसले को सही ठहराते हुए राखीराम की अपील खारिज कर दी। दोनों पक्षों को अपील का अपना-अपना खर्च वहन करने का निर्देश दिया गया।