
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: छत्तीसगढ़ में लागू ‘धर्म स्वातंत्र्य कानून 2026’ (Freedom of Religion Law 2026) को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। ईसाई समाज ने इस कानून के कई प्रावधानों को असंवैधानिक बताते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। समाज के प्रतिनिधि क्रिस्टोफर पाल ने याचिका दाखिल कर विशेष रूप से अवैध मतांतरण पर आजीवन कारावास की सजा को गलत ठहराया है।
याचिका में कहा गया है कि कानून में शामिल कई दंडात्मक प्रावधान अत्यधिक कठोर हैं। नए कानून के तहत जबरन, प्रलोभन या धोखाधड़ी से किए गए मतांतरण को अपराध की श्रेणी में रखते हुए 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान किया गया है।
कानून के अनुसार, सामूहिक मतांतरण के मामलों में 10 साल से लेकर आजीवन कारावास और न्यूनतम 25 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है। वहीं सामान्य मामलों में 7 से 10 साल की सजा तय की गई है। यदि पीड़ित नाबालिग, महिला या एसटी-एससी, ओबीसी वर्ग से है, तो सजा 10 से 20 साल तक हो सकती है।
कानून के तहत धर्म परिवर्तन से पहले जिला मजिस्ट्रेट को पूर्व सूचना देना अनिवार्य किया गया है, जिस पर 30 दिनों के भीतर आपत्ति दर्ज कराई जा सकती है। साथ ही, इस कानून के तहत सभी अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती घोषित किया गया है। हालांकि, अपने मूल धर्म में वापसी को इस कानून में मतांतरण नहीं माना गया है।
राज्य सरकार का कहना है कि यह कानून धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने के लिए नहीं, बल्कि गैर-कानूनी तरीकों जैसे प्रलोभन, दबाव और धोखाधड़ी से होने वाले मतांतरण को नियंत्रित करने के उद्देश्य से लाया गया है।