ग्रेच्युटी विवाद: नियंत्रक ने 30 दिन में भुगतान को कहा था, राज्य ने कहा अधिकार ही नहीं, हाई कोर्ट ने दिया नया निर्देश
जल संसाधन विभाग के 8 सेवानिवृत्त कर्मचारियों की बकाया ग्रेच्युटी पर हाईकोर्ट ने अहम आदेश दिया। नियंत्रक प्राधिकारी ने 30 दिन में भुगतान को कहा था, पर ...और पढ़ें
Publish Date: Fri, 09 Oct 2026 04:54:51 PM (IST)Updated Date: Fri, 09 Oct 2026 04:54:51 PM (IST)
प्रतीकात्मक चित्रHighLights
- आठ सेवानिवृत्त कर्मचारियों ने बकाया ग्रेच्युटी के लिए हाईकोर्ट पहुंचे।
- राज्य सरकार बोली सरकारी कर्मचारी ग्रेच्युटी एक्ट में शामिल नहीं।
- हाईकोर्ट ने नियंत्रक प्राधिकारी को नए सिरे से सुनवाई कहा।
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: जल संसाधन विभाग के आठ सेवानिवृत्त कर्मचारियों की बकाया ग्रेच्युटी का भुगतान कराने की मांग पर हाई कोर्ट ने संबंधित अधिकारी को पहले यह तय करने का निर्देश दिया है कि ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 इन कर्मचारियों पर लागू होता भी है या नहीं।
न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु ने कहा कि राज्य सरकार के कर्मचारियों को इस कानून की धारा 2(ई) में ‘कर्मचारी’ की परिभाषा से बाहर रखा गया है। इसलिए नियंत्रक प्राधिकारी को अपने अधिकार क्षेत्र के सवाल पर दोनों पक्षों को सुनकर कानून के अनुसार नया आदेश देना होगा।
मामले में सुखराम विश्वकर्मा (70), नरेंद्र सिंह कौशिक (64), रामनाथ रात्रे (68), जयप्रकाश उपाध्याय (70), मोहित राम साहू (73), शत्रुहन प्रसाद कौशिक (72), राजकुमार श्रीवास (67) और शत्रुहन लाल श्रीवास (65) ने अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं। सभी जल संसाधन विभाग में लंबे समय तक सेवा देने के बाद सेवानिवृत्त हुए हैं।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार उन्होंने तीन दशक से अधिक समय तक विभाग में सेवा की। सेवानिवृत्ति के बाद विभाग ने ग्रेच्युटी की कुछ राशि का भुगतान किया, लेकिन शेष राशि रोक दी गई। इसके बाद उन्होंने ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम के तहत नियंत्रक प्राधिकारी के समक्ष आवेदन किया। नियंत्रक प्राधिकारी ने 12 दिसंबर 2025 को विभाग को बकाया राशि 30 दिन में देने का आदेश दिया था। देरी होने पर कानून के अनुसार ब्याज देने की बात भी कही गई थी। इसके बावजूद भुगतान नहीं होने पर कर्मचारियों ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।
राज्य ने कहा- नियंत्रक प्राधिकारी को अधिकार ही नहीं
राज्य की ओर से दलील दी गई कि अधिनियम की धारा 2(ई) में केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारियों को ‘कर्मचारी’ की परिभाषा से बाहर रखा गया है। इसलिए इन कर्मचारियों के मामलों में नियंत्रक प्राधिकारी को ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम के तहत सुनवाई और आदेश देने का अधिकार नहीं था। इस आधार पर उसके आदेशों का पालन कराने के लिए दायर याचिकाएं स्वीकार योग्य नहीं हैं।
हाई कोर्ट ने राज्य की इस आपत्ति को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता राज्य सरकार के कर्मचारी हैं, इसलिए नियंत्रक प्राधिकारी को पहले इस बात पर विचार करना होगा कि अधिनियम उनके दावों पर लागू होता है या नहीं। कोर्ट ने संबंधित प्राधिकारी को दोनों पक्षों को सुनने के बाद अधिकारिता और अधिनियम की लागू होने की स्थिति पर कानून के अनुसार उचित आदेश पारित करने का निर्देश दिया। इसी के साथ सभी आठ याचिकाओं का निराकरण कर दिया गया।