
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। पत्नी को वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करने के लिए साथ रहने का आदेश दिलाने की मांग करने वाले पति को हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली। हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी के न्यायालय में उपस्थित नहीं होने और पति के बयान का प्रतिवाद नहीं होने मात्र से यह साबित नहीं हो जाता कि पत्नी बिना उचित कारण के अलग रह रही है। पति को अपने दावे के आवश्यक तथ्यों को साक्ष्यों से साबित करना होगा। न्यायमूर्ति पीपी साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की पीठ ने अंबिकापुर कुटुंब न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए पति की अपील खारिज कर दी।
मामला सिद्धार्थ यादव और मधु यादव का है। दोनों का विवाह 7 मई 2017 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में हुआ था। 9 सितंबर 2019 को उनकी बेटी का जन्म हुआ, जो फिलहाल मां के साथ रह रही है। पति का कहना था कि विवाह के करीब एक साल बाद पत्नी छोटी-छोटी बातों पर विवाद करने लगी।
बेटी के अन्नप्राशन कार्यक्रम के बाद 1 मार्च 2020 को वह अपने भाई के साथ बेटी को लेकर मायके चली गई और वापस नहीं लौटी। पति ने पत्नी और बेटी का खर्च उठाने तथा उन्हें वापस लाने के प्रयास करने का दावा करते हुए वैवाहिक संबंध बहाल कराने के लिए याचिका दायर की थी।
पत्नी के खिलाफ एकतरफा कार्यवाही हुई थी । अंबिकापुर कुटुंब न्यायालय में समन मिलने के बावजूद पत्नी उपस्थित नहीं हुई थी। इसके बाद अदालत ने उसके खिलाफ एकतरफा कार्यवाही की। पति ने दलील दी कि उसके और पिता के बयान को चुनौती नहीं दी गई, फिर भी अदालत ने वैवाहिक संबंध बहाल करने की मांग खारिज कर दी। पत्नी की ओर से हाई कोर्ट में फैसले का बचाव करते हुए कहा गया कि कुटुंब न्यायालय ने साक्ष्यों के आधार पर सही निर्णय लिया है।
हाई कोर्ट ने पाया कि पति द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों में पत्नी के अलग रहने के पीछे कथित प्रताड़ना का उल्लेख था। कुटुंब न्यायालय ने यह भी माना था कि पति ने पत्नी को वापस लाने के लिए गंभीर प्रयास करने के बजाय करीब एक साल नौ महीने बाद याचिका दायर की।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी के उपस्थित नहीं होने से पति का दावा स्वतः प्रमाणित नहीं हो जाता। पति को यह साबित करना जरूरी था कि पत्नी बिना उचित कारण के उससे अलग रह रही है। पीठ ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कुटुंब न्यायालय के निष्कर्षों में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। यदि पति के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी में लगाए गए आरोप और आपराधिक कार्यवाही अंततः झूठी साबित होते हैं, तो वह कानून के अनुसार उचित उपाय अपना सकता है। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने पति की अपील खारिज कर दी।