नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा है कि लोक अदालत का अधिकार केवल पक्षकारों के बीच समझौता या सुलह कराने तक सीमित है। समझौता नहीं होने पर वह विवादित मामले का गुण-दोष के आधार पर फैसला नहीं कर सकती। जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल ने सीएसपीडीसीएल की याचिका पर आदेश दिया। कोर्ट ने 6 दिसंबर 2014 के राष्ट्रीय लोक अदालत, बिलासपुर के अवार्ड और 15 जून 2015 के श्रम न्यायालय के आदेश को रद कर दिया।
मामला ग्राम घुमा सिरगिट्टी बिलासपुर निवासी मीना बाई पटेल और चमरू पटेल के पुत्र छोटू उर्फ शत्रुहन की नौकरी के दौरान मौत से जुड़ा था। मृतक के माता-पिता ने वर्कमैन क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 की धारा 22 के तहत नौ लाख 880 रुपये मुआवजे का दावा किया था। मृतक सीएसपीडीसीएल के लिए काम कर रहे ठेकेदार अभिनव तिवारी के अधीन कार्यरत बताया गया था। सीएसपीडीसीएल ने अपनी देनदारी स्वीकार किए बिना और विरोध के साथ नौ लाख 880 रुपये की राशि अस्थायी रूप से जमा की थी।
कंपनी का स्पष्ट कहना था कि यदि उसे मुआवजा देना पड़ा तो यह राशि ठेकेदार से वसूल की जाएगी। ठेकेदार ने भी मृतक के साथ नियोक्ता-कर्मचारी संबंध होने से इनकार किया था। कार्रवाई के दौरान 11 नवंबर 2014 को सीएसपीडीसीएल के वकील की गैरहाजिरी के कारण कंपनी को एकतरफा कर दिया गया। इसके बाद मृतक के माता-पिता ने कहा कि मुआवजा राशि पहले ही जमा हो चुकी है, इसलिए वे अपने दावे को गुण-दोष के आधार पर आगे नहीं बढ़ाना चाहते। मामला राष्ट्रीय लोक अदालत में भेज दिया गया।
6 दिसंबर 2014 को लोक अदालत ने राशि जमा होने और दावेदारों के दावा नहीं दबाने के आधार पर कार्रवाई समाप्त कर दी। साथ ही ठेकेदार को मुआवजा देने की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया। इसके बाद मुआवजा राशि के वास्तविक आश्रितों का निर्धारण और राशि के वितरण की प्रक्रिया जारी रखी गई। सीएसपीडीसीएल ने 19 दिसंबर 2014 को एकतरफा आदेश और लोक अदालत के अवार्ड को निरस्त करने के लिए आवेदन दिया।
कंपनी ने कहा कि उसकी गैरहाजिरी जानबूझकर नहीं हुई थी। उसके अधिवक्ता की डायरी गुम हो गई थी, जिसके कारण सुनवाई की तारीख की जानकारी नहीं रह सकी। बाद में जानकारी मिलते ही आवेदन प्रस्तुत कर दिया गया। श्रम न्यायालय ने 15 जून 2015 को आवेदन खारिज कर दिया, जिसके खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर हुई।
हाई कोर्ट ने कहा- समझौते के बिना अवार्ड ही नहीं हो सकता
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ पंजाब बनाम जलौर सिंह और बीपी मोईदीन सेवामंदिर बनाम एएम कुट्टी हसन सहित अन्य फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि लोक अदालत के सामने दो ही रास्ते होते हैं। पहला, पक्षकारों के बीच समझौता हो तो उसी आधार पर आदेश पारित किया जाए। दूसरा, समझौता नहीं हो तो मामला संबंधित न्यायालय को वापस भेज दिया जाए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोक अदालत के पास कोई तीसरा रास्ता नहीं है, जिसमें वह खुद विवादित अधिकार और दायित्व तय कर दे। इस मामले में सीएसपीडीसीएल ने राशि केवल विरोध के साथ जमा की थी। इसे समझौते की सहमति या ठेकेदार की जिम्मेदारी से मुक्ति की स्वीकृति नहीं माना जा सकता था। ठेकेदार ने भी अपनी जिम्मेदारी से इनकार किया था। ऐसे में पक्षकारों के बीच न तो साझा प्रस्ताव था, न सहमति और न ही कोई अंतिम समझौता।
मामला फिर श्रम न्यायालय पहुंचा
हाई कोर्ट ने सीएसपीडीसीएल को एकतरफा कार्रवाई से राहत देते हुए 11 नवंबर 2014 का एकतरफा आदेश, 15 जून 2015 का श्रम न्यायालय का आदेश और 6 दिसंबर 2014 का राष्ट्रीय लोक अदालत का अवार्ड रद्द कर दिया। मामला अब कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त, श्रम न्यायालय बिलासपुर को नए सिरे से सुनवाई के लिए भेजा गया है। सभी पक्षों को पर्याप्त अवसर देकर मामले का गुण-दोष के आधार पर फैसला करने का निर्देश दिया गया है।
राशि सुनवाई के परिणाम तक रहेगी अधीन
पहले जमा की गई नौ लाख 880 रुपये की राशि नई सुनवाई के परिणाम के अधीन रहेगी। पक्षकारों को 29 सितंबर 2016 को श्रम न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है। पुराने मामले को देखते हुए हाई कोर्ट ने श्रम न्यायालय को उपस्थिति की तारीख से पांच महीने के भीतर मामले का यथासंभव शीघ्र निराकरण करने कहा है।