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गर्भपात होने से आरोपित पर अपराध साबित नहीं होता: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

बिलासपुर हाई कोर्ट ने अंबिकापुर निवासी अवधेश जायसवाल को आईपीसी की धारा 313 के तहत मिली 3 साल की सजा को निरस्त करते हुए बरी कर दिया है।

By Kamlesh RajakEdited By: Manoj Kumar Tiwari
Publish Date: Tue, 29 Sep 2026 03:51:43 PM (IST)Updated Date: Tue, 29 Sep 2026 03:51:43 PM (IST)
गर्भपात होने से आरोपित पर अपराध साबित नहीं होता: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

HighLights

  1. छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अंबिकापुर के अवधेश जायसवाल को बरी किया।
  2. केवल गर्भपात होना आईपीसी की धारा 313 का सबूत नहीं।
  3. जबरदस्ती और महिला की असहमति साबित करना अभियोजन के लिए अनिवार्य।

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: गर्भपात कराने के आरोप में तीन साल की सजा पाए अंबिकापुर के अवधेश जायसवाल को हाई कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल ने कहा कि केवल महिला के गर्भवती होने और बाद में गर्भपात होने से भारतीय दंड संहिता की धारा 313 का अपराध साबित नहीं होता।

अभियोजन को यह भी साबित करना जरूरी है कि गर्भपात आरोपित के जबरदस्ती करने से हुआ और महिला की सहमति के बिना कराया गया। याचिकाकर्ता अवधेश जायसवाल उर्फ बबुआ, उम्र 24 वर्ष, ग्राम नवागढ़, महामाया रोड, अंबिकापुर, जिला सरगुजा निवासी हैं। विशेष न्यायालय ने 18 मई 2016 को उन्हें धारा 313 के तहत तीन साल के सश्रम कारावास और पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा दी थी।


अभियोजन के अनुसार 27 मई 2013 को महिला ने शिकायत की थी कि आरोपित ने शादी का झांसा देकर करीब एक साल तक संबंध बनाए। गर्भ ठहरने के बाद शादी से इन्कार करते हुए 25 मई को उसे गोलियां दी गईं, जिससे तीन महीने के भ्रूण का गर्भपात हो गया। ट्रायल कोर्ट ने दुष्कर्म और अन्य आरोपों से उसे बरी कर दिया था, लेकिन धारा 313 में दोषी माना।

हाई कोर्ट ने पाया कि पीड़िता ने अपने बयान में कहीं नहीं कहा कि गर्भपात उसकी इच्छा के विरुद्ध कराया गया। उसने आरोपित के साथ करीब एक साल तक सहमति से संबंध होने की बात भी स्वीकार की थी। डाक्टर ने गर्भपात होने की पुष्टि की, लेकिन सामान्य गर्भपात और बाहरी कारण से गर्भपात व दोनों की संभावना बताई। आरोपित से भ्रूण के जैविक संबंध की कोई डीएनए रिपोर्ट भी नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट के प्रभु उर्फ कुलंदईवेलु बनाम तमिलनाडु राज्य के फैसले का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने अपील मंजूर कर ली और दोषसिद्धि व सजा रद कर दी।