नईदुनिया प्रतिनिधि बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एनडीपीएस एक्ट के एक मामले में निचले न्यायालय द्वारा 7 आरोपियों को दी गई 10 से 15 वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा को निरस्त कर दिया है। हाई कोर्ट की युगल पीठ ने पाया कि पुलिस द्वारा तलाशी, जब्ती सैंपलिंग और सीलिंग की अनिवार्य वैधानिक प्रक्रियाओं में कई गंभीर प्रक्रियात्मक खामियां थीं। अदालत ने सभी आरोपियों को 'संदेह का लाभ' देते हुए तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है।
10 अक्टूबर 2022 को थाना आजाद चौक, रायपुर की पुलिस को मुखबिर से नशीली गोलियों की बिक्री की सूचना मिली थी। पुलिस ने सबसे पहले नियाजुद्दीन उर्फ विक्की और जे. भास्कर राव को पकड़ा। उनके मेमोरेंडम बयानों के आधार पर अन्य आरोपी रविंद्र गोयल (प्रथम मेडिकल स्टोर के संचालक), मुकेश कुमार साहू, मोहम्मद हसन, साहिल हसन, आकाश विश्वकर्मा और विरल पटेल को मामले में आरोपी बनाया गया।
पुलिस का दावा था कि आरोपियों से भारी मात्रा में ट्रामाडॉल और अल्प्राजोलम की गोलियां/कैप्सूल जब्त किए गए।
विशेष न्यायाधीश (एनडीपीएस), रायपुर ने 1 सितंबर 2025 को आरोपियों को दोषी ठहराते हुए 10 से 15 साल की कैद और 1,00,000 से 1,50, 000 रुपये तक के जुर्माने की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट ने वैधानिक त्रुटियों के कारण की सजा की रद
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने सुनवाई के दौरान पुलिस जांच में कई वैधानिक त्रुटियां पाईं।
समय में विरोधाभास (धारा 42 का उल्लंघन): जांच अधिकारी का कहना था कि धारा 42(2) का पंचनामा शाम 4:00 बजे तैयार किया गया, जबकि सीएसपी कार्यालय में इसकी पावती दोपहर 3:25 बजे दर्ज थी। यानी रिपोर्ट बनने से 35 मिनट पहले ही प्राप्त हो गई, जो व्यावहारिक रूप से असंभव है।
धारा 50 का गलत अनुपालन: आरोपियों को दिए गए नोटिस में पुलिस अधिकारी से भी तलाशी कराने का विकल्प दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानूनन केवल किसी राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट के समक्ष तलाशी का अधिकार दिया जाता है, खुद जांच अधिकारी से तलाशी का विकल्प देना अमान्य है।
सैंपलिंग में खामियां (धारा 52-A): नशीली दवाओं के सैंपल मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में नहीं निकाले गए। साथ ही, एफएसएल रिपोर्ट और जब्ती के समय बताए गए कैप्सूलों की संख्या में बड़ा अंतर पाया गया।
केवल मेमोरेंडम बयान पर गिरफ्तारी: आरोपी विरल पटेल और आकाश विश्वकर्मा से कोई भी प्रतिबंधित दवा बरामद नहीं हुई थी। उनकी गिरफ्तारी केवल सह-आरोपी के बयान के आधार पर की गई थी। उच्चतम न्यायालय के तोफान सिंह मामले के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि सह-आरोपी का बयान अपने आप में सजा का आधार नहीं बन सकता।
सुरक्षित कस्टडी (धारा 55) के सबूत गायब: पुलिस न्यायालय में मालखाना रजिस्टर या सील सत्यापन का रिकॉर्ड प्रस्तुत करने में विफल रही, जिससे जब्त सामग्री की सुरक्षा और कस्टडी की कड़ी टूट गई।
डीजीपी को समीक्षा कर अफसर पर कार्रवाई के निर्देश
हाई कोर्ट ने एनडीपीएस मामलों की जांच में पुलिस अधिकारियों द्वारा की जा रही घोर लापरवाही और उदासीनता पर गहरा असंतोष व्यक्त किया। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा "यह लापरवाही केवल संयोग या अनजाने में हुई चूक नहीं हो सकती। यह जांच में गंभीर लापरवाही और गैर-पेशेवर रवैये को दर्शाती है, जिससे एनडीपीएस कानून का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।" इस निर्णय की प्रति तुरंत पुलिस महानिदेशक छत्तीसगढ़ को व्यक्तिगत ध्यान के लिए भेजी जाए।
डीजीपी इस मामले में हुई गंभीर चूकों की समीक्षा करें और जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान कर नियमानुसार कार्रवाई करें। एनडीपीएस मामलों की निष्पक्ष व कानून सम्मत जांच सुनिश्चित करने के लिए सभी जांच अधिकारियों के लिए व्यापक निर्देश और मानक संचालन प्रक्रिया जारी किए जाएं।