
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। श्रम न्यायालय ने एक पेंचीदा मामले में 12 लाख रुपये से अधिक मुआवजा दावा खारिज किया। अदालत ने पाया कि महिला ने खुद को मृतक की पत्नी बताया था, लेकिन वह वास्तव में मृतक की मकान मालकिन थी, जहां वह किराए पर रहता था। आरोपित दावे को फर्जी करार देते हुए अदालत ने कहा कि मुआवजे के लिए रिश्तों की गलत प्रस्तुति की गई। यह भी सामने आया कि महिला के बच्चों के पिता कोई अन्य व्यक्ति थे, जिसकी पुष्टि स्कूल रिकॉर्ड से हुई।
मामले के अनुसार, गंगा बाई ने दावा किया था कि उसका पति रामेश्वर केवट 4 जनवरी 2017 को सरकंडा क्षेत्र में निर्माण कार्य के दौरान दूसरी मंजिल से गिरकर मारा गया। उसने मकान मालिक डा. पंकज टेंभूर्णिकर और ठेकेदार आशीष शाह को जिम्मेदार ठहराते हुए 8,06,640 रुपये मुआवजा, 50 प्रतिशत पेनल्टी और 12 प्रतिशत ब्याज की मांग की थी। याचिका में कहा गया कि सुरक्षा व्यवस्था की कमी के कारण हादसा हुआ।
ट्विस्ट: कोर्ट में एंट्री हुई असली पत्नी और 4 बच्चों की
लेकिन सुनवाई के दौरान मामला तब पूरी तरह बदल गया जब प्रतिवादी पक्ष ने दावा किया कि गंगा बाई मृतक की पत्नी नहीं है। अदालत के आदेश पर मृतक की असली पत्नी धारमीन बाई केवट और उसके पुत्र यशपाल, राजपाल और पुत्री भूमिका को भी मामले में शामिल किया गया। असली परिवार ने कहा कि मृतक केवल किरायेदार था और गंगा बाई के मकान में रहता था, जबकि उसकी वैधानिक पत्नी और बच्चे को छोड़कर उसने कभी भी गंगा बाई से वैवाहिक संबंध नहीं बनाए।
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जिरह में ताश के पत्तों की तरह ढह गया फरेब
जिरह के दौरान अदालत में कई अहम तथ्य सामने आए। स्कूल रिकॉर्ड में मृतक के बच्चों के पिता का नाम “विजय राम साही” दर्ज पाया गया, जिससे गंगा बाई का दावा कमजोर हो गया। इसके अलावा यह भी स्वीकार किया गया कि दोनों अलग-अलग जातियों से संबंधित हैं और वैध विवाह का कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। यह भी सामने आया कि मृतक की पहली पत्नी से तलाक नहीं हुआ था। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि गंगा बाई ने प्रशासन से 1 लाख रुपये की अनुग्रह राशि पहले ही प्राप्त कर ली थी।
हादसा साबित नहीं, न ही एफआईआर साबित
कोर्ट ने अपने 26 पन्नों के विस्तृत आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता न तो दुर्घटना को साबित कर सकी और न ही यह स्थापित कर सकी कि मृतक कार्य के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। न कोई चश्मदीद गवाह पेश किया गया, न एफआईआर या पोस्टमार्टम रिपोर्ट को विधिवत साबित किया गया।
असली पत्नी और बच्चों को भी नहीं मिला हक
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल समाचार पत्रों की कतरनें या अनुमान मुआवजे का आधार नहीं हो सकते। अंत में न्यायालय ने याचिका को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि न तो गंगा बाई को मुआवजा मिलेगा और न ही असली पत्नी या बच्चों को इस वाद के तहत कोई राहत दी जा सकती है, क्योंकि मूल दावा ही सिद्ध नहीं हुआ।