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बाल सम्प्रेक्षण गृहों से बच्चों के भागने की घटना पर हाई कोर्ट ने दिए केंद्र सरकार को पक्षकार बनाने के निर्देश

छत्तीसगढ़ के बाल सम्प्रेक्षण गृहों (महासमुंद और बिलासपुर) से किशोरों के फरार होने की घटनाओं पर हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार ...और पढ़ें

By Manoj Kumar TiwariEdited By: Manoj Kumar Tiwari
Publish Date: Wed, 12 Aug 2026 09:55:42 AM (IST)Updated Date: Wed, 12 Aug 2026 09:55:42 AM (IST)
बाल सम्प्रेक्षण गृहों से बच्चों के भागने की घटना पर हाई कोर्ट ने  दिए केंद्र सरकार को पक्षकार बनाने के निर्देश
प्रतीकात्मक चित्र

HighLights

  1. छत्तीसगढ़ सरकार से सुरक्षा ऑडिट व सुधार की मांगी रिपोर्ट।
  2. महासमुंद और बिलासपुर की घटनाओं पर डिवीजन बेंच सख्त।
  3. मिशन वात्सल्य के तहत सुरक्षा गार्ड का प्रावधान नहीं।

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में बाल देखभाल संस्थाओं (सीसीआई) से किशोरों के भागने की लगातार सामने आ रही घटनाओं को हाई कोर्ट ने गंभीरता से लिया है। महासमुंद के सरकारी आब्जर्वेशन होम से आठ किशोरों के भागने और बिलासपुर की संस्था से चार किशोरों के फरार होने के मामले में राज्य सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए 156 सिक्योरिटी गार्ड की मांग की है। इसके लिए केंद्र सरकार से वित्तीय सहायता मांगी गई है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने 11 अगस्त 2026 को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को मामले में आवश्यक पक्षकार बनाते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय से वित्तीय सहायता पर जवाब मांगा है। कोर्ट ने केंद्रीय गृह सचिव से यह बताने को कहा है कि 26 बाल देखभाल संस्थाओं में 156 सुरक्षा गार्ड की तैनाती के प्रस्ताव के लिए केंद्र की लागू योजनाओं या दिशा-निर्देशों के तहत सहायता दी जा सकती है या नहीं।


कोर्ट के आदेश के अनुसार चार अगस्त 2026 को महासमुंद के सरकारी आब्जर्वेशन होम से आठ किशोर खिड़की की ग्रिल और परिसर की बाउंड्री वाल पर लगे कंटीले तार को तोड़कर भाग गए थे। घटना के बाद तत्काल तलाशी अभियान चलाया गया, जिसमें चार किशोरों को वापस संस्था में लाया जा चुका है। शेष चार की तलाश जारी है। इसी तरह बिलासपुर की बाल देखभाल संस्था से भागे चार किशोरों में से तीन को बरामद कर लिया गया है, जबकि एक की तलाश जारी है।

चीफ सेक्रेटरी ने शपथपत्र में बताई सुरक्षा व्यवस्था

कोर्ट के चार अगस्त के आदेश के पालन में छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव ने व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल किया। इसमें बताया गया कि राज्य सरकार ने घटनाओं के बाद बाल देखभाल संस्थाओं की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। महासमुंद की संस्था में क्षतिग्रस्त खिड़की की ग्रिल और कंटीले तार की मरम्मत कराई गई है। रात में निगरानी और गश्त बढ़ाई गई है। संवेदनशील स्थानों पर रोशनी और सीसीटीवी निगरानी मजबूत की गई है। इसके अलावा बच्चों के लिए नियमित काउंसिलिंग, मनोसामाजिक सहयोग और व्यवहार प्रबंधन की व्यवस्था भी की गई है।

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राज्य में 83 और 26 बाल देखभाल संस्थाएं

मुख्य सचिव के शपथपत्र के अनुसार छत्तीसगढ़ में देखभाल और संरक्षण की जरूरत वाले बच्चों के लिए 83 तथा कानून से संघर्षरत बच्चों के लिए 26 बाल देखभाल संस्थाएं हैं। इन संस्थाओं में बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, पुनर्वास और समग्र विकास के लिए विभिन्न व्यवस्थाएं लागू हैं। हर संस्था में बच्चों की समस्याएं और शिकायतें सुनने के लिए चिल्ड्रन कमेटी, प्रशासनिक निगरानी के लिए मैनेजमेंट कमेटी और सुझाव पेटी की व्यवस्था है। साप्ताहिक गतिविधि कैलेंडर के तहत शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, खेल, सांस्कृतिक कार्यक्रम, जीवन कौशल और काउंसिलिंग जैसी गतिविधियां भी संचालित की जा रही हैं।

50 बच्चों की क्षमता वाली संस्था में गार्ड का प्रावधान नहीं

राज्य सरकार ने शपथपत्र में सुरक्षा व्यवस्था की एक बड़ी कमी भी स्वीकार की है। मिशन वात्सल्य के तहत 50 बच्चों की क्षमता वाली बाल देखभाल संस्था में अधिकारी प्रभारी, काउंसलर, प्रोबेशन अधिकारी, हाउस मदर या हाउस फादर, पैरामेडिकल स्टाफ, स्टोरकीपर, शिक्षक, आर्ट एंड क्राफ्ट एवं म्यूजिक शिक्षक, पीटी इंस्ट्रक्टर, रसोइये और अन्य कर्मचारियों का प्रावधान है। हालांकि, इस स्टाफ संरचना में भागने की कोशिश रोकने के लिए अलग से सिक्योरिटी गार्ड का प्रावधान नहीं है। राज्य ने माना कि महासमुंद और बिलासपुर की घटनाओं में बच्चों ने खिड़की की ग्रिल, कंटीले तार और बाउंड्री वाल का इस्तेमाल कर भागने में सफलता हासिल की।

156 गार्ड के लिए 4.68 करोड़ रुपये सालाना बजट की मांग

राज्य सरकार ने आठ अगस्त को केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को पत्र भेजकर इस समस्या से अवगत कराया है। इसमें 26 बाल देखभाल संस्थाओं में 156 सिक्योरिटी गार्ड तैनात करने के लिए सालाना करीब 4.68 करोड़ रुपये के बजट की मांग की गई है। राज्य ने पत्र में किशोर न्याय नियमों के उस प्रावधान का भी उल्लेख किया है, जिसमें संस्थाओं में रखे गए बच्चों की श्रेणी को ध्यान में रखते हुए पर्याप्त संख्या में सुरक्षा कर्मियों की व्यवस्था का प्रावधान है।

होमगार्ड और पुलिस से भी मांगी सुरक्षा

राज्य सरकार ने 26 कानून से संघर्षरत बच्चों वाली और छह देखभाल एवं संरक्षण की जरूरत वाले बच्चों की सरकारी संस्थाओं समेत कुल 32 संस्थाओं में होमगार्ड या अन्य सुरक्षा कर्मियों की तैनाती के लिए महानिदेशक, होमगार्ड को भी पत्र भेजा है। इसके अलावा पुलिस विभाग को सभी बाल देखभाल संस्थाओं का व्यापक सिक्योरिटी ऑडिट करने के निर्देश दिए गए हैं। पुलिस से नियमित गश्त, रात में विशेष निगरानी, थानों के अधिकारियों द्वारा संस्थाओं का निरीक्षण, संवेदनशील स्थानों की पहचान, पुलिस नोडल अधिकारी नियुक्त करने और आपात स्थिति में कार्रवाई की प्रक्रिया तय करने को कहा गया है। कर्मचारियों का पुलिस वेरिफिकेशन कराने और हर महीने मॉक ड्रिल तथा इमरजेंसी रिस्पांस अभ्यास कराने का प्रस्ताव भी रखा गया है।

केंद्र सरकार को बनाया आवश्यक पक्षकार

हाई कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने बाल देखभाल संस्थाओं की सुरक्षा मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार से वित्तीय सहायता और आवश्यक सहयोग मांगा है। ऐसे में मामले के प्रभावी निराकरण के लिए केंद्र का पक्ष जानना जरूरी है। डिवीजन बेंच ने रजिस्ट्री को केंद्र सरकार को गृह मंत्रालय के सचिव के माध्यम से आवश्यक पक्षकार बनाने का निर्देश दिया। अतिरिक्त महाधिवक्ता को याचिका, उसके दस्तावेज और मुख्य सचिव का शपथपत्र केंद्र सरकार के उप सॉलिसिटर जनरल को उपलब्ध कराने को कहा गया है।

केंद्र और राज्य दोनों से मांगी ताजा रिपोर्ट

हाईकोर्ट ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के सचिव को शपथपत्र दाखिल कर यह बताने का निर्देश दिया है कि 156 सुरक्षा गार्ड की तैनाती और अन्य सुरक्षा उपायों के लिए राज्य को वित्तीय सहायता किस तरह दी जा सकती है। वहीं मुख्य सचिव को भी ताजा शपथपत्र दाखिल कर अब तक की कार्रवाई की स्थिति बताने को कहा गया है। इसमें सिक्योरिटी ऑडिट, अतिरिक्त सुरक्षा कर्मियों की तैनाती, फरार किशोरों की बरामदगी और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए उठाए जाने वाले कदमों की जानकारी देनी होगी। मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त 2026 को होगी।