
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: रायपुर में पिता और भाइयों के साथ मकान के मालिकाना हक को लेकर चल रहे विवाद में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एकतरफा डिक्री के आधार पर बेदखली की कार्रवाई को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल ने विजय कुमार साहू की याचिका खारिज कर दी है।
हाई कोर्ट ने जिला न्यायालय के उस आदेश में हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया, जिसमें एकतरफा फैसला और डिक्री निरस्त कर मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट में भेजा गया था। अब सभी पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलने के बाद ही मुकदमे का गुण-दोष के आधार पर फैसला होगा।
याचिकाकर्ता विजय कुमार साहू ने रायपुर के चंगोराभाठा गांव स्थित 2167 वर्गफुट के मकान और जमीन का कब्जा दिलाने तथा उपयोग के बदले लाभ दिलाने की मांग करते हुए 31 अक्टूबर 2022 को दीवानी मुकदमा दायर किया था। इसमें उनके पिता रामधन साहू और भाइयों राजेश कुमार साहू तथा लक्ष्मीनारायण साहू को पक्षकार बनाया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी किए, लेकिन वे तामील नहीं हो सके। इसके बाद 12 अप्रैल 2023 को इश्तहार प्रकाशित कर समन की तामील कराने की अनुमति दी गई। सात मई 2023 को प्रकाशन के बाद भी प्रतिवादी अदालत में उपस्थित नहीं हुए। इसके बाद तीन मई 2024 को विजय कुमार साहू के पक्ष में एकतरफा फैसला और डिक्री जारी कर दी गई।
डिक्री के पालन की कार्रवाई शुरू होने पर पिता और भाइयों ने नौ जून 2025 को एकतरफा फैसला निरस्त करने के लिए आवेदन दिया। उनका कहना था कि उन्हें मुकदमे की जानकारी नहीं थी और फैसले का पता 23 मई 2025 को निष्पादन की कार्रवाई के दौरान चला। उन्होंने संपत्ति पर अपने अधिकार का दावा करते हुए कहा कि डिक्री कायम रहने पर उन्हें बेघर होना पड़ सकता है। ट्रायल कोर्ट ने उनका आवेदन खारिज कर दिया था। इसके बाद जिला न्यायाधीश की अदालत ने 23 जुलाई 2026 को अपील स्वीकार करते हुए एकतरफा डिक्री निरस्त कर दी और मुकदमा नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस भेज दिया। इसी आदेश को विजय कुमार साहू ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाई कोर्ट ने पाया कि समन की तामील नहीं होने पर उसी दिन अखबार में प्रकाशन के माध्यम से तामील कराने का आवेदन स्वीकार कर लिया गया था। अदालत ने इस बात पर ध्यान दिया कि ट्रायल कोर्ट ने यह संतुष्टि दर्ज नहीं की थी कि प्रतिवादी जानबूझकर समन से बच रहे थे या सामान्य तरीके से समन की तामील संभव नहीं थी।
न्यायमूर्ति अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि वैकल्पिक तरीके से समन की तामील कराने से पहले निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन और संबंधित परिस्थितियों पर न्यायिक संतुष्टि जरूरी है। एकतरफा डिक्री निरस्त करने के आवेदन में यह भी देखा जाना चाहिए कि संबंधित पक्ष के अदालत में उपस्थित नहीं होने का पर्याप्त कारण था या नहीं।
हाई कोर्ट ने माना कि अपीलीय अदालत ने प्रतिवादियों को अपना पक्ष रखने का अवसर देने और मामले का नए सिरे से निर्णय कराने का आदेश देकर कोई ऐसी त्रुटि नहीं की है, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप जरूरी हो। इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई।