
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। बहुचर्चित संजू त्रिपाठी हत्याकांड में अभियोजन पक्ष हत्या की साजिश से लेकर गोली चलाने और आरोपितों की घटनास्थल पर मौजूदगी तक के आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर सका। सुनवाई में पुलिस की कहानी और सारे सबूत ताश की तरह ढह गए। पुलिस ने जिन लोगों को चश्मदीद गवाह बताया था, उन्होंने अदालत में गोलीबारी होते या हमलावरों को देखने से इनकार कर दिया। जब्ती के स्वतंत्र गवाह भी पुलिस की कार्रवाई की पुष्टि नहीं कर सके।
सीसीटीवी फुटेज की मूल रिकॉर्डिंग मशीन जब्त नहीं की गई थी। मोबाइल की कॉल डिटेल और लोकेशन को प्रमाणित करने के लिए जरूरी साक्ष्य भी पेश नहीं हुए। हथियारों और मृतक के शरीर से मिली गोलियों का वैज्ञानिक मिलान तक नहीं कराया गया। इन कमियों के आधार पर दसवें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश आदित्य जोशी की अदालत ने 30 अक्टूबर 2026 को मुख्य आरोपित कपिल त्रिपाठी और जय नारायण त्रिपाठी सहित सभी 22 आरोपितों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
अभियोजन के अनुसार, 14 दिसंबर 2022 को दोपहर करीब 4:15 बजे संजू उर्फ प्राणनाथ त्रिपाठी अपनी एमजी हेक्टर कार क्रमांक सीजी-10-एजेड-2608 से लौट रहे थे। सकरी बाईपास पर मिनरल चेक पोस्ट के पास आरोपितों ने कथित रूप से पारिवारिक और संपत्ति विवाद के कारण रची गई साजिश के तहत उनकी कार का पीछा किया। स्पीड ब्रेकर के पास गाड़ियां अड़ाकर कार रोकी गई और उन पर गोलियां चलाई गईं। इस घटना में उनकी मौत हो गई। सकरी थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 120-बी, 34, 201 और 341 तथा आर्म्स एक्ट की धारा 25 और 27 के तहत केस दर्ज किया गया था।
पान दुकान संचालक व मुख्य गवाह मनोज साहू को पुलिस ने घटना का चश्मदीद बताया था। अदालत में उन्होंने कहा कि घटना के समय वे अपनी दुकान पर नहीं थे। शाम करीब पांच बजे फोन आने के बाद मौके पर पहुंचे थे। उन्होंने न तो गोली चलते देखी और न ही किसी आरोपित को हमला करते हुए देखा।
पंचर दुकान संचालक व मुख्य गवाह मोहम्मद सरफराज ने बताया कि घटना के दिन उनकी दुकान बंद थी। उन्होंने न हमलावरों को देखा और न ही किसी गाड़ी को मौके से भागते हुए देखा।
मृत की पत्नी किरण त्रिपाठी ने बताया कि उन्हें घटना की जानकारी घर के कर्मचारी पप्पू से मिली थी। वे सूचना मिलने के बाद मौके पर पहुंची थीं। उन्होंने गोलीबारी होते हुए स्वयं नहीं देखा था। इस तरह पुलिस जिन गवाहों के आधार पर घटनास्थल पर हमलावरों की मौजूदगी और गोलीबारी साबित करना चाहती थी, वे अदालत में उस घटनाक्रम की प्रत्यक्ष पुष्टि नहीं कर सके।
पुलिस ने वाहनों, मोबाइल फोन और हथियारों की जब्ती तथा आरोपितों के कथित मेमोरेंडम को महत्वपूर्ण साक्ष्य बनाया था। लेकिन स्वर्णिम तिवारी , सुहैल जेम्स , रितीश तिवारी और चंद्रशेखर वस्त्रकार सहित कई पंच गवाहों ने अदालत में पुलिस की कार्रवाई का समर्थन नहीं किया। उन्होंने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर होने की बात तो मानी, लेकिन पुलिस की मौजूदगी में जब्ती और मेमोरेंडम की कार्रवाई होने से इनकार किया।
पुलिस ने छह स्थानों से सीसीटीवी फुटेज जुटाने का दावा किया था। इनमें एसएल सोनी का मकान, शारदा फायर सेफ्टी, सर्वमंगला पेट्रोल पंप और सीआरपीएफ कैंप सहित अन्य स्थान शामिल थे। लेकिन पुलिस ने मूल डीवीआर जब्त करने के बजाय पेन ड्राइव में फुटेज की प्रतियां लीं। फुटेज उपलब्ध कराने वालों के बयानों में भी विरोधाभास सामने आए। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को प्रमाणित करने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत जरूरी प्रमाणपत्रों की वैधानिकता पर भी सवाल उठे। फुटेज में वाहनों के नंबर और उनकी पहचान भी स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं हो सकी।
पुलिस ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड और मोबाइल टावर लोकेशन के आधार पर आरोपितों के बीच संपर्क और उनकी मौजूदगी साबित करने की कोशिश की। लेकिन टेलीकॉम कंपनियों के अधिकृत नोडल अधिकारियों को गवाही के लिए पेश नहीं किया गया और सीडीआर के साथ जरूरी प्रमाणपत्रों की कमी रही। कई सिम दूसरे व्यक्तियों के नाम पर पंजीकृत थे। पुलिस यह साबित नहीं कर सकी कि घटना के समय उन नंबरों का इस्तेमाल संबंधित आरोपित ही कर रहे थे।
अदालत के सामने यह भी महत्वपूर्ण रहा कि मोबाइल टावर लोकेशन किसी बड़े भौगोलिक क्षेत्र का संकेत देती है। इससे किसी व्यक्ति का घटनास्थल के किसी खास स्थान या मकान के भीतर होना निश्चित रूप से साबित नहीं किया जा सकता। कथित बातचीत की पुष्टि के लिए आवाज के नमूने लेकर वैज्ञानिक परीक्षण भी नहीं कराया गया था।
पुलिस ने एलांट्रा, स्कार्पियो, थार, स्विफ्ट डिजायर और बलेनो सहित कई वाहनों को मामले से जोड़ने की कोशिश की थी। लेकिन स्वतंत्र गवाहों ने जब्ती की कार्रवाई का समर्थन नहीं किया। वाहनों, मोबाइल फोन और हथियारों को हत्या की घटना तथा आरोपितों से जोड़ने वाली साक्ष्य की कड़ियां भी विश्वसनीय ढंग से स्थापित नहीं हो सकीं।
पोस्टमार्टम के दौरान मिली तीन गोलियों और कपड़ों की जब्ती 19 दिसंबर 2022 को दर्शाई गई, जबकि हत्या 14 दिसंबर को हुई थी। इस बीच इन वस्तुओं की अभिरक्षा और उनके सुरक्षित रखे जाने का संतोषजनक लिखित विवरण सामने नहीं आया। दाह संस्कार के बाद राख से मिले छह धातु के टुकड़ों का भी वैज्ञानिक परीक्षण नहीं कराया गया।
बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने अदालत में दलील दी कि केवल हथियार, वाहन या मोबाइल जब्त कर लेने से उनका हत्या में इस्तेमाल होना साबित नहीं होता। इसके लिए स्वतंत्र गवाह, वैज्ञानिक परीक्षण और साक्ष्य की सुरक्षित अभिरक्षा जरूरी है। उन्होंने सीसीटीवी फुटेज के मूल स्रोत और प्रमाणपत्र, कॉल डिटेल की वैधानिक पुष्टि, सिम के वास्तविक उपयोगकर्ता तथा हथियारों और गोलियों के मिलान की कमी को प्रमुखता से उठाया। अभियोजन पक्ष इन सवालों के संतोषजनक जवाब और आरोपितों की संलिप्तता साबित करने वाले पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर सका।
अदालत ने जय नारायण त्रिपाठी, अमन गुप्ता उर्फ सोनू, कल्याणी तिवारी, सुमित्रा त्रिपाठी, कपिल त्रिपाठी, प्रेम उर्फ बजरंग श्रीवास, सुमित निर्मलकर, भारत तिवारी, आशीष तिवारी, रवि उर्फ ईश्वर प्रसाद तिवारी, राजेन्द्र कुमार ठाकुर, केदार सिंह ठाकुर, रमेश राजपूत, रवि सिंह राजपूत, सावन पाठक, मोनू उर्फ अभिषेक मिश्रा, युसूफ हुसैन, एजाज उर्फ राजू अंसारी, प्रशीन गुप्ता, मोहम्मद दानिश, ताबीज अंसारी उर्फ इरफान अहमद और संदीप यादव उर्फ पप्पू दाढ़ी को बरी किया।
अदालत के सामने अभियोजन की ओर से पेश साक्ष्य आरोपितों की पहचान, हत्या की साजिश, घटनास्थल पर उनकी मौजूदगी और हथियारों के इस्तेमाल को संदेह से परे साबित नहीं कर सके। चश्मदीदों के समर्थन में न आने, स्वतंत्र गवाहों के मुकरने और वैज्ञानिक तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की कमियों के कारण अभियोजन की कहानी की महत्वपूर्ण कड़ियां प्रमाणित नहीं हो पाईं।
पुलिस को अभियाजन की रिपोर्ट का इंतजार
एएसपी पंकज पटेल ने कहा कि अदालत के आदेश का विश्लेषण किया जा रहा है। अभियोजन से मामले की रिपोर्ट मांगी गई है। रिपोर्ट आने के बाद हाई कोर्ट में अपील की जाएगी।