बिलासपुर। क्या आप जानते हैं शहर में अहंकार के अंत की परंपरा (रावण दहन) कब शुरू हुई थी। यह बात शायद ही किसी को मालूम होगी पर हम बताते हैं कि कैसे और कब शुरुआत हुई। आजादी के छह साल बाद वर्ष 1953 में रेलवे क्षेत्र स्थित नार्थ ईस्ट इंस्टीट्यूट मैदान में सबसे पहले 20 फीट ऊंचा रावण का पुतला दहन किया गया था। तब मालधक्का वालों व रेलकर्मियों ने इस परंपरा को शुरू किया गया।
आइए जानते हैं हिंदुस्तानी सेवा समाज की ओर से आयोजित इस आयोजन से जुड़े इतिहास के बारे में। रेलवे क्षेत्र को विभिन्न् संस्कृतियों का संगम स्थल माना जाता है। वर्ष 1950 में उत्तर प्रदेश निवासी मोहन लाल कश्यप, सूर्यकुमार अवस्थी, बिहारी लाल यादव, शौखीराम मौर्य, मुदलियार बाबू आदि रामलीला प्रेमी व रेलकर्मियों ने सर्वप्रथम चुचुहियापारा रेलवे फाटक के पास पेट्रोमैक्स की रोशनी में रामलीला कराना प्रारंभ किया। शुरुआती दिनों में इसका स्वरूप छोटा था। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्श जीवन चरित्र का मनमोहक लीला मंचन का कलाप्रेमी जनमानस के उत्साह व सहयोगी समर्थन से विस्तार होता गया।
कुछ ही वर्षों में बिलासपुर नगर व नजदीकी गांवों का प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र बन गया। 10 दिनों तक चलने वाली इस रामलीला के समापन पर दशहरा के दिन रावण पुतला दहन करने का निर्णय लिया गया। करीब तीन साल बाद चुचुहियापारा फाटक के आसपास ही रावण दहन कार्यक्रम हुआ। बाद में रेलवे नार्थ ईस्ट इंस्टीट्यूट मैदान में आयोजन होने लगा। उस समय रेलवे नार्थ ईस्ट इंस्टीट्यूट मैदान खाली जमीन थी और इसमें बाउंड्रीवाल भी नहीं थी। दर्शकों की बढ़ती संख्या के अनुरूप रावण पुतला के आकार व ऊंचाई में भी वृद्धि की गई। 20 फीट से 30 फीट और फिर 40 फीट के बाद पिछले कुछ सालों से 65 फीट ऊंचा पुतला जलाया जा रहा है। दशहरा उत्सव बिलासपुर क्षेत्र का सबसे पुराना व प्रतिष्ठित आयोजन है। आम जनता का विशेष आत्मीय लगाव है।
तत्कालीन डीआरएम बनर्जी ने दी थी यह सौगात
रेलवे इंस्टीट्यूट मैदान में एक चबूतरा और लोहे के दो फ्रेम (खंभे) नजर आते हैं। इसका भी एक अलग इतिहास है। समाज के पदाधिकारियों व सदस्यों के अलावा रेलकर्मियों के निवेदन पर तत्कालीन डीआरएम एमके बनर्जी ने खास तौर पर रावण दहन के लिए यह सुविधा उपलब्ध कराई थी। उससे पहले आयोजन समिति के सदस्य बांस या अन्य कोई चीजों के सहारे रावण दहन करते थे।